हम तो लिक्खेगा, और ठेलेगा !
असली भदेस मिलावटी माल  तहखाने  में है....   नीचे जाओ, नीचे  !

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आप अक्षरों को सुविधानुसार छोटा या बड़ा कर लें

मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों

अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !

लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने ईंट रोड़े बटोरे हैं !

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सोचा कि पन्दरहा अगस्त पर कुछ लिखूँ, अच्छा अवसर है.. देश के लिये, भारत माता की लुटती अस्मिता पर चिन्ता जताने वालों में अपना भी नाम दर्ज़ करा लूँ, लेकिन… ? यही तो मेरी तक़लीफ़ है कि सोचता ही सोचता हूँ, करता कुछ भी नहीं । चाय पी कर चायवाले को पैसे देने में जितना भी समय लगता है, उसका सदुपयोग सोचने में ही करता हूँ ! यह कोई कम है, क्या ? सोच लेता हूँ.. वह भी आलू, टमाटर, बैंगन, करेले के भाव पर नहीं, बल्कि देस-मुलुक के हालत पर.. यही क्या कम है ? वरना यहाँ तो 88 फ़ीसदी पब्लिक तो सोचने लायक भी न रही । अपने को ज़िन्दा रखने की, होः तूऽऽ तू.. चल्हः कबड्डी कबड्डी कबडी कबडी कबडि कबडि बडि बडि बड्डिः बड्डिहः हः हः …में हाँफ कर जैसे तैसे साँझ ढले अपने पाले में लौट गुईंया संग लेट लेते हैं । सो, सोचने का चारज़ आजकल हमईं लोगन के पास है, उनके बिहाफ़ पर सोच लेते हैं, चिन्तित हो लेते हैं । और क्या चाहिये ?

पंडिताइन थोड़ी चिन्तित भाव से पूछती हैं, “ ऎई, कुछ लिखोगे नहीं.. देखना सबलोग पंद्रह अगस्त पर कितना लेख-ऊख लिखेंगे, और तुम रोज़ खटर पटर करते रहते हो.. यह नहीं कि कुछ लिख ही डालो । अब नाटकीय हुये बगैर, मेरी गुज़र नहीं.. सो, जो आज्ञा, चोखेरवाली-सखी ! फिर भी मैं अपना झोला-पिटारी टटोलता हूँ, कि शायद कुछ आफ़-बीट हाथ ही लग जाये ? देखते हैं !

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वह चीख उठी, “ पवित्र-पावन पर्व पर.. मुर्दाबाद ? हे भगवान, इस आदमी को हो क्या गया है ? “ क्या बवाल है, भाई.. मेहरिया से दोस्ती, समझो जी का ज़ंज़ाल ! ऎ भाई, बोलना मत बीच में, पूरा नहीं हुआ है, दूसर के लुगाई से दोस्ती, समझो आँधी भूचाल ! सोचा, थोड़ा खीझने की होती है, “बोला था न कि, हमरे बिलागींग को न भड़काओ.. अरे मनगढ़ंत फोटू थोड़े ही है, यह ? न ही ‘पाकिस्तान से आयी है’ का डिस्क्लेमर लगाया है । यह तो ख़ालिस अपने देश की छाती चीर कर चलती हुयी भारत की जीवनरेखा जी.टी. रोड पर ली गयी है ।  अरे यार.. वही जी.टी.रोड जो शेरशाह सूरी बनवा कर, हमारी गौरमिन्ट के लिये सिरदर्द छोड़ गया, जो इसके रखरखाव में ही काँख रही है । यह हमारे मुलुक की अर्थव्यवस्था का अनर्थ करने का अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र करार दिया जाता, अंग्रेज़ इस रास्ते से सोना ढो कर ले गये, वो अलग ! उस ज़माने में सी.आई.ए. या आई.एस.आई. न होने का अफ़सोस भला किस पार्टी को न होगा । ई बिलागींग बड़ी बेलाग चीज़ होती है, यारों.. बेलाग = बेलागिंग = बेलगाम ~~.आगिंग !

सो हम बेलगाम हुई गये थे । तोऽ.. फोटो खींचा गया, मुनमुन  ( मेरी बेटी ) के कोडक हाटशाट से । ना, ना.. हाटशाट की वजह से यह हाट नहीं है, न ही कोडरमा के पास के गाँव के मंदिर की दीवार पर उकेरे जाने से, और ई मुर्दाबाद – ज़िन्दाबाद तो भाई गाँधी-ज़िन्ना की विरासत है, सो हमलोग इसको आगे नहीं बढ़ायेंगे, तो क्या हमारी आईपाड  पीढ़ी इसको संभालेगी ? उसने तो एक आसान रास्ता खोज निकाला है, जो अच्छा न लगे.. असहमत हो.. ज़्यादती हो गयी…  पेरेन्ट आउटडेटेड हैं…  बस, शिटशिटा के विरोध कर दो..ओहः शिट यार ! इतिश्री, और  सुनाओ ! सुनायें क्या, कद्दू ? आज तो जैसे इस कीबोर्ड से शिट ही निकल रहा है !

तो, मित्रों.. मैंने जानबूझ कर इस भित्तिलेख के मज़मून को धुँधला कर दिया है, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था के शिट को दिखाय रहा है, सामाजिक न्याय माँग रहा है, माल पेलते नेतृत्व से ज़वाब तलब कर रहा है..काहे भाई, ई तो पन्द्राह अगस्त का 61वाँ है !

ई तो राधिका परसाद मास्साब रटा गये थे कि 14 के बाद 15 ही आता है । अब देखिये, कि 14 को एक देश आज़ाद हुआ, पता नहीं, अंगेज़ से कि हिन्दुस्तान से ? लेकिन ऊहाँ राजगद्दी हुई गयी, सो बाकी बचा भी स्वतंत्र घोषित किया गया.. औ’ विश्व में देखा गया एक अद्भुत व्यायाम.. नायक बोला – प्रसन्नचित्त… जनता झूमी – अहा हा हा हा , प्रसन्नचित्त…  अहा हा हा हा ! तिस पर भी आप सब 15 अगस्त पर ईहाँ अच्छा ख़ासा रो गा गये ! जाओ.. देखो जाके, अगड़म-बगड़म पुराण में लिक्खा भया है.. मौत औ’ मार्केटिंग से कोई सयाना भी नहीं बच सकता, तो हम ही काहे को इससे बचने का कलंक लें ? तब के गद्दीनशी़नी की मार्केटिंग  आज तलक चल रही है, सत्ता  एक ऎसा ही अनोखा ब्रांड है, यारों ! 15 अगस्त.. अहा हा हा हा, स्वतंत्र हो..अहा हा हा हा

दोस्त लोग इस मुबारक मौके पर बिसूर रहे हैं, यह उनकी सोच और किस्मत । मैं तो अपने ‘ अहा हा हा हा ‘ के साथ रात के अँधेरे में, चुपके से सुतंत्र भारत माई के पास पहुँचा कि जन्मदिन की बधाई दे आऊँ । हे राम, यह क्या ? वहाँ सचिवालय पर तो जगमग रोशनी और यहाँ टिमटिमाते ढिबरी का अतिमंद प्रकाश ! माई पड़ी कराह रही थीं.. चौंका..”माई क्या हो गया ? “ माई ने मुँह ढके ढके उत्तर दिया, “ पता नहीं, बेटा.. बहुत दर्द  हो रहा है । “ अरे कहाँ दर्द हो रहा है, यह तो बताओ ? माई तो उल्टे तैश खा गयीं, खीझ कर बोलीं “ कहाँ कहाँ बताऊँ ? सिर से पैर.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक की रग रग दुख रही है । “ फिर अचानक उनके अंदर की माँ चैतन्य हो गयीं, संभल कर उठने का प्रयास करते हुये प्रतिप्रश्न किया “ और बता.. लड्डू वड्डू खाये कि नहीं ? अरे पगले मेरी सुध काहे ले रहा है ? जब से बहाल हुयी हूँ, सब मेरा डिमोशन दर डिमोशन ही तो करते आ रहे हैं । चलो, अपने ही बच्चे तो हैं.. मेरा क्या ? मेरी तो बहाली के 61 पूरे हो गये.. बीमार भी चल रही हूँ…  मुझ बीमार को अब और इतना ज़लील भी न करो, बस  62 में मेरी बची खुची इज़्ज़त के साथ मुझे रिटायर करवा दो ,और अब नूतन माई लाने की जुगत करो,मेरे बेटों ! उनको मुझ लाचार को एक्सटेंसन में मत घसीटने देना । जाओ.. मेरी तरफ़ से  सबको बोलना जय हिन्द !

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ladywinks कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? ढेर सारे स्वर उठे हैं कि मैं तंज़ में लिखता हूँ । क्या ऎसा है ? तो, होने दीजिये कौन मैं रोज़ रोज़ लिख ही पाता हूँ ? आज यथार्थ और व्यंग दोनों इस कदर घुलमिल गये हैं कि उनको अलग करके लिख पाने की विद्वता मुझमें तो नहीं है । ज़बरन आप सब के बीच में घुस जाने से ही क्या होता है ? आप सहनशील देश के नागरिक हैं, सो मुझे भी सह लीजिये । रख़्शंदा को इस तंज़ से तंज़ीदगी है.. तो रख़्शंदा, तुम्हें मालूम हो कि मैं तंज़ानिया के पासपोर्ट पर इस मुलुक में रह रहा हूँ । अब मेरा पासपोर्ट तो बदलने से रहा, भले ही किसी दिन एक्सपायर हो जाये.. वह अलग बात है, देखेंगे ! 

शिव को कैसे मनाऊँ रे….शिव मानत नाहिं ऽ

 

 

 

शिव को कैसे मनाऊँ रे शिव मानत नाहिं … शाल दुसाला शिव लेतो नाहीं है, बाघचर्म कहाँ पाऊँ रे शिव मानत नाहीं । मेवा मिठाई शिव भावत नाहीं है, भाँग धतूरा कहाँ पाऊँ रे शिव मानत नाहीं ….आह ! बचपन में सुनी हुई मिथिला-वैशाली के ’नचारी ’ लोकगीत की यह पंक्तियाँ आज भी कान में गूँजा करती हैं । भोले शिव..  औघड़ शिव…  दानी शिव… आशुतोष शिव… क्रोधी  शिव…  महानुरागी शिव… नेपथ्य से श्रीराम की लीलाओं को संचालित करते शिव

हलाहल पान करते शिव.. प्रियतमा विरह से दग्ध तांडव करते शिव.. .. आह ! अनोखे हैं हमारे शिव – आज है श्रावण मास का प्रथम सोमवार..  पंडिताइन का व्रत..  मेरे जैसा औघढ़ पाकर कुपित होती है..  फिर भी क्यों छोड़े अपना शिव ? शिव पर इनका इतराना देखो तो आप भूल ही जाओगे..  जल चढ़ाने को मंदिर को लपकते श्रद्धालु , उत्साह उछाह.. आस्था विश्वास.. वर और वरदान के प्रतीक भोले शिव…  देते पहले हैं, सोचते बाद में शिव !

                                       हमारे शिव भोले शिव -अमर एवं रूबी शिवार्पित 21 जुलाई 2008

         हर हर महादेव शिव शंभु त्रिपुरारीॐ नमः शिवाय

अब ऎसे औघड़दानी को हम क्या चढ़ा सकते हैं, सभी में तो..  शिव मानत नाहीं ! आज एक पोस्ट ही चढ़ा देते हैं, किंवा चिहुँक कर इसी से मान जायें

                                            श्रीरुद्राष्टकम

                          ani_leaf         ॐ        ani_leaf

नमामी शमीशान् निर्वार्णरूप्ं । विभुं व्यापक्ं ब्रह्म् वेद स्वरूप्ं ।

निज्ं निर्गुण्ं निर्विकल्प्ं निरीह्ं । चिदाकाशमाकाशवास् भजेऽह्ं ॥१॥

निराकारमोङ्कारमूल्ं तुरीय्ं । गिराज्ञान् गोतीतमीश्ं गिरीश ।

कराल्ं महाकाल् काल्ं कृपाल्ं । गुणागार स्ंसारपार्ं नतोऽह्ं ॥२॥

तुषाराद्रि स्ंकाशगौर्ं गभीर्ं । मनोभूत् कोटि प्रभाश्री शरीर्ं ।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारूग्ंगा । लसद्भाल् बालेन्दु कण्ठे भुज्ंगा ॥३॥

चलत्कुण्डल्ं भ्रुसुनेत्र्ं विशाल्ं । प्रसन्नानन्ं नीलकण्ठं दयाल्ं ।

मृगाधीश् चर्माम्बर्ं मुण्डमाल्ं । प्रिय्ं श्ंकर्ं सर्वनाथ्ं भजामि ॥४॥

प्रचण्ड्ं प्रकृष्ट्ं प्रगल्भ्ं परेश्ं । अखण्ड्ं अज्ं भानुकोटि प्रकाशम् ।

त्रय्ःशूलनिर्मूलन्ं शुलपाणिं । भजेऽह्ं भवानीपतिं भावगम्य्ं ॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ंद् दाता त्रिपुरारि ।

चिदान्ंद - सदोह मोहापहारी।प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथहारी ॥६॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्द । भजतीह लोके परे वा नराणां ।

न तावत्सुख्ं शान्ति सन्ताप नाश्ं । प्रसीद् प्रभो सर्व भूताधिवास्ं ॥७॥

न जानामि योग जप्ं नैव पूजां। नतोऽह्ं सदा सर्वदा श्ंभु तुभ्यं ।

जरा जन्म दुःखौघतातप्य मान्ं।प्रभो पाहि आपन्नमामीश श्ंभो।रुद्राष्टकमिद्ं प्रोक्त्ं विप्रेण् हरतोषये।ये पठन्ति तेषां शम्भुःप्रसीदति ॥८॥

                                                        इति श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत्ं श्री रुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

सो, मित्रों मेरे पास जो श्रद्धा-सुमन हैं, वह इस पोस्ट के रूप में त्रिपुरांतकारी भोलेनाथ को चढ़ा दिया । आप साक्षी हैं, कैलाशपति आपको सुख-शांति दें ।

ब्लागजगत में टिप्पणियों का भविष्य – एक सार्थक पेशकश

पहले तो यह बता दूँ कि हमारे शिवकुमार मिसिर महा के खखेड़ी जीव हैं, आज सुबह नित्यकर्म से अर्धनिवृत होकर ( दूसरी खेप बकाया कर आया था ) पंडिताइन की सौतन को पकड़ कर बैठ गया । पहले बड़कऊ को देखा..उनकी दिनोंदिन गंभीर से गंभीतम होती जाती पोस्ट पर घिघ्घी बँध गयी, एक स्माइली ठोका और ब्लागस्वामी के रहम-ओ-करम पर छोड़ कर आगे बढ़ा । येल्लो..छोटकऊ तो सो रहे थे । गंगानहान के दिन तो दिखाने भर का पुण्य तो कर लेते..बाद में चित्रगुप्त ताऊ से कह कहा कर उनके खाते में दो-तीन ज़ीरो मैं बढ़वा ही देता । बहुतों से मुलाकात वगैरह हुई । कवि के बाद ब्लागर प्रजाति ही ऎसी है जिससे आने वाली पीढ़ीयाँ पनाह माँगेंगी । उनकी रचनाधर्मिता से नहीं.. बल्कि पेलो और ठेलोधर्मिता *। * से  ! किसी कवि के चिंचिंयाते तरन्नुम से निज़ात पानी हो..एक फ़िकरा भर छोड़ने की देरी होगी..” भागिये भाई साहब, वो ब्लागर आ रहा हैं  ! “ कहाँ है ? हमारे चौराहा-कवि सहम कर अपनी सद्यःउगली हुई आधी कविता कंठ में सटक कर चौकन्ने होते हैं । वो देखिये नुक्कड़ पर टहल रहा है, और लीजिये महाशय-जी यह जा.. वह जा । खड़बड़  खड़बड़ बगल की गली में घुसायमान हो थरथर काँप रहे हैं, आशंकित हैं… कोस रहे हैं, दाँत पीस रहे हैं..,’ छुट्टा हो गये हैं.. कोई भरोसा नहीं आज क्या लिये टहल रहे हों,  पा जायें तो यहीं के यहीं ठेल दें..होरॆ राम होरॆ राम हॊरे कृ..’ जेई देशे बाघेर भय - सेई देशे रात हॊय ( जहाँ बाघ का डर था – वहीं पर रात हो गयी ) अब जय हनुमान ज्ञानगुन सागर की रुँधीं गुहार 33 rpm में, उनके पता नहीं कहाँ से निकल रही है । निकल रही है तो बस समझ लीजिये कि निकल ही पड़ी है, यहीं बात ख़त्तम ! असल बात तो ब्लागर पावर की है, सो देख लें, चवन्नी उछाल के । चवन्नी फ़ुरसतिया  गुरु के पास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, संपर्क करें । नहीं, चवन्नी चैप तो रांग नम्बर है, जी । उछालै वाली चवन्नी तो हम सुकुल गुरु को कानपुर छोड़ते वक्त ही दे आये थे ! मुकर जायें तो बात दूसरी है । कलयुग में तो भगवान भी फुसला कर ही सही एकाध पुण्य-कार्य तो करवा ही लेते हैं, फिर बाद में मुकर जाते हैं, बाँयें हाथ से आम चूसते हुये दायें हाथ से बरज देते हैं, ‘चल फूट, फलप्राप्ति की चिंता जिन कर ।’ जा आपस में टिप्पणी लड़ा.. वही तेरा प्रारब्ध है ! खुद तो चूसने को आम पा गये हैं, और… इहाँ फ़क़त टिप्पणियों से बहटिया बहटिया के हम संतों से गवा रहे हैं, “ चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें..♪ ♪ सन्नम..♫ ♫ ऊह्हू ﬠ ♪ऊह्हू ﬠ ♪ “ लगे रहिये….जमाये रहिये ….ऊह्हू ﬠ♪ऊह्हू ﬠ♪ एडसेंस तो पीठ पर झाड़ू मार गया.. ऊह्हू ﬠ♪ऊह्हू ﬠ♪ ऽऽ चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें..♪ ♪ सन्नम..♫ ♫ ऊह्हू ﬠ ♪ऊह्हू ﬠ ♪

                                                                                mail (2)

                                                        DalmBar

                                                                       मेरी चिरकुट मंडली

तो भाईयों ( अउर उनके सिर पे सवार बहिनों ), कैसी चली है..ये हवा अपुन के ब्लागिंग में..ऽ ♫ऽ ♫♪♪ ,क्या हो गया है ? चिरकुट चिंतन के संक्रमण की ऎसी महामारी फैलती दिख रही है, कि पूछो ही मत ! ब्लागर ने तो अपनी ताकत से सरकारों को हिला दिया है, कुछ तो है.. जो कि, फ़िलिम वाले हिज़ हाइटनेस  भी दुनिया से लुकाय-छिपाय के नहीं बल्कि गुर्राय-गुर्राय के रोज अइसी-तइसी पेले पड़े हैं । ऎसे में देखिये..आजकल अपने ज़िंदादिल शिवकुमार जी किस कदर चिरकुटग्रस्त दिख रहे हैं ।  न्यू-इम्प्रूव्ड के उलट अपनी पोस्ट के शीर्ष में ऊह्हू-चिरकुट काहे चिपका देते हो मित्रवर ? हमारी गौरमिंन्टिया गाहे बगाहे विरोध जताने की परंपरा निभाती है, सो… समझॊ कि हम भी विरोधई जता रहे हैं, अपनी गली से ! आपके टिप्पणी बक्से में आधा घंटे फँसे रहने के बाद, निकल कर हिंयाँ से यानि अपने परदेश से विरोध प्रगट कर रहें हैं । तो जानम समझा करो, बुरा मानोगे तो बाकी लोग हँसेंगे । हँसेंगे.. काहे कि प्रगट ही तो कर रहे हैं… आप रिसीविंग ले लीजिये । किसी को विरोध दिखायी दिया अब तक ? तो मेरा यह चिरकुट विरो…ऽऽध, ईश्श..ऽ उड़ि बाबा ऒरॆ ठाकुर, संगॆ दोषे ग्रामॊ  नष्टॊ  ( সংগে দোষে গ্রামো নষ্ট ) बूझलेन तो दादा ? संगत में तो गाँव तबाह हो जाता है । नाहिं नाहिं ऊशमें गोरमाने का बात नेंईं है, ऊ तो गलती से बोलाः गया था, मूँ से ! अच्छा तो एक काम करते हैं, आप तो मिलीजुली को चलाने का पर्याप्त अनुभव रखते हैं, सो…..पहले बोलिये मानेंगे तो ? सो… भविष्य को देखते हुये, क्यों न एक टिप्पणी बैंक खोली जाये ?

                                                         शिवकुमार-अमर कुमार टिप्पणी बैंक स्थापित 18 जुलाई 2008

शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लाग की परंपरा में एक शिव अमर टिप्पणी बैंक खोलने का विचार कैसा है ? यह 3-5 का काम अच्छा चलेगा, यानि तीन ले जाओ...पाँच दे जाओ । लोग ज़रूरत पड़ने पर यदि तीन टिप्पणी उधार हाँ हाँ.. वही वही, लोन लेंगे और बदले में गैर-ब्लागिंग के फ़ालतू टाइम में दो नई टिप्पणी गढ़ के ओरिज़िनल तीन के संग जोड़ कर पाँच बना कर दे जायेंगे । यानि अपनी बैंक की पूँजी में बिना लागत मुनाफ़ा । टिप्पणियों की शुरुआती पूँजी ? हम हैं ना, काहे फिकिर करते हो ? अभी सबसे जमा करा लिया जाय । जमा की हुई पाँच टिप्पणी पर फ़ी पोस्ट दो नई टिप्पणी का ब्याज़ लिया जायेगा । है ना चोखा आइडिया ? धन्यवाद दो कि तुमको पार्टनर बनाने का प्रस्ताव भेज रहा हूँ, वरना तुम्हरे बड़कऊ तो हास्य-व्यंग ( लेबल लगा देने से व्यंग थोड़े बन जाता है, जी ) में घायल होकर वैकल्पिक विधा की खोज में भटक कर हमारे दरवज़्ज़े पर भड़भड़ा कर जा चुके हैं । जल्दी जवाब दो भैय्या, आख़िर हम कब तक लैट्रिन में छुपे बैठे रहेंगे ? उनका कोनो भरोसा नहीं, हिंयईं लैट्रिनवा में घुसि के फोटू अँईंच लें और भोर में छापि दें । तब तक हमार ई पोस्टिओ ससुर गंधा जायेगी । उनकी तो चौंचक हलचल  होय जावेगी, अउर लेकिन अपनी भी तो सोचो, भईय्या । भागि आवो, बोलि देयो, “ अब लौं नसानि – अब न नसइहौं “ ताड़ाताड़ी ( झटपट ) ! हाँय भइय्या ?

                                                      newsflash

                     अमर शिव टिप्पणी बैंक का गूगल चीफ़ द्वारा भव्य उद्घाटन ।

              श्री शिवकुमार भारत स्थित ब्लागर टिप्पणी ब्यूरो के चीफ मनोनीत किये गये

ऎसी सुर्खियाँ आपके कदम चूमेंगी । सच्ची में..लोग टिप्पणी जमा कर जाया करेंगे और हम लोग ऎश करेंगे, ठीक एमवे वालों की तरह, बड़ी सोच का बड़ा जादू तो सुनबै किये होंगे । हमलोग तो माछेर तेले माछ भाजा ( মাছের তেলে মাছ ভাজা ) हमें उसी मछली के तेल से उसी मछली की फ़्राई बनाना है । टिप्पणी जमा करो…कौन सी किस गुट के खाते व स्कीम में रखी जायेगी, यह निर्धारित करो । इतने गुटों के बीच निर्गुटों का भी एक गुट सामने आ रहा है, वह मुश्किल पैदा कर सकता है, कोई वांदा नहीं, इनको देख लिया जायेगा । कन्याभेदी, हृदयभेदी, सिसकारी, हुँकारी कैटेगरी वगैरह की विशेष माँग रहेगी । वाह-वाह , लगे रहिये, जमा गये जी जैसे लुहाती टिप्पणियों पर ब्याज़ दर इसके टर्नओवर के हिसाब से कम भी की जा सकती है । जरा इधर भी घूम जाइये की गुहार लगाने वालों से रिरियाहट सरचार्ज़ लेने पर भी विचार किया जा सकता है । गोहार लगा लगा कर टिप्पणी माँगने वाले भी हैं, उनको अपात्रता की चेतावनी देनी पर सकती है, खैर अपने घर में तो इसको आप मौखिक ही संभाल लेंगे, यह विश्वास है । एक मुफ़्त सुविधा ( शुरुआत में ) बाद में अर्थ का अनर्थ विशेषज्ञ तो आप हो ही, अब तक आये डिपाज़िट की झलक भर दूँगा ( बीमा नहीं है अभी ) , यह जुगाड़ू सुविधा अधिक दिन तक मुफ़्त देना ठीक नहीं, ब्लागर बंधुओं के मुँह जुगाड़ बुरी तरह लग गया है । अच्छा, अब तक आये टिप्पणियों को देख लीजिये , यह कुछ ऎसी है…

                                                       जित देखो तित समीर

©आपकी सोच को नमन है
©एक और संवेदनशील पोस्ट..
©संवेदना का झरना..
©बहुत मार्मिक प्रस्तुति !
©यही जिन्दगी है जी।

©एक विचारणीय आलेख।
©माल की पोस्ट है... साधुवाद :-)
©बहुत खूब सत्य को उकेरती रचना।
©कल्‍पनालोक का यथार्थ बहुत क्रूर है...
©लिखते रहिये, ©Bahut badhiya
©सुंदर प्रस्तुति....बधाई

©Ha ha ha, Nice and fine blog
©बड़ी ही गहरी बात मार दी जी....
©बहुत सुन्दर लिखा है
©just mindbloowingggggggg
©बहत सुन्दर.बहुत बधाई.
©यह लेख सोचने पर मजबूर कर देता है

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©विचारणीय लेख है ....यह तो

©खूबसूरत रचना...हमेशा की तरह.
©अच्छी लगी आपकी रचना
©रचना मस्त है
©बहुत अच्छी रचना
©रचना पसंद आई.
©हमेशा की तरह संवेदना जगाती रचना.
©अजी गजब ढा दिया रचना ने

©सही कह रहे हो
©बहुत कायदे से भाव उकेरे हैं-बेहतरीन
©पोस्ट मार्मिक बन पड़ी है
©अच्छा है, कभी इधर भी घूम जाइये
©बहुत सुन्दर हे इस कविता के भाव
©बात तो ठीक है, पर करें क्या ?

©बहुत अच्छा पोस्ट लिखा है आपने.
©आपकी अभिव्यक्ति बेहद सुंदर है
©बहुत बढिया और सुंदर आलेख !
©वास्तव में बहुत लाजवाब लेख  बधाई |
©दिल को अन्दर तक हिला डाला आपके लेख ने
©खुश कर दिया भाई

©हाहाहा मजा आ गया

मज़ा तो ले गये अल्ली रज़ा, अब सिर्फ़ हम और आप बचे हैं । टिप्पणियों की मारकेटिंग में अपना भविष्य देखिये, प्रभु । आज 3609 चिट्ठे तो धड़ाधड़ महाराज के यहाँ दर्ज़ हैं, मान ही लें कि मात्र 900 ही सक्रिय हैं, तो जुटे लगभग 450 पाठक, पेट भरने भ्रर को लोग 5 टिप्पणी से बहल जाते हैं..तो 450 X 5 = 2250 टिप्पणियों की माँग नित्यप्रति होगी । और…अपने बफ़र स्टाक में तो 500 भी नहीं है, जी । तो चिरकुटई..ऽऽईश्श..वही न, संगॆ दोषे ग्रामॊ  नष्टॊ  ! हाँ, मेरी वाली पंडिताइन अभी अभी एक भूलसुधार कर गयी हैं..पहली वाली लाइन में पंडिताइन की सौतन बोले तो मेरी कम्पू-बेबी..न कि तेरी वाली पंडिताइन ! कृपया आप बंधुगण भी ध्यान दें, गलती सुधार ली गयी है । तो शिवकुमार गुरु, सोचो मत…हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णयुग आना ही चाहता है, एकदम से आसमाँ पर घिरी चली आ रही है । देयर इज़ अ बिग एन्ड प्रोसपेरस मार्केट इन टिप्पणीज़ , हरी-अप !

जरा सोचिये, क्या बात होगी… ख़ूब ग़ुज़रेगी, जब बैठेंगे तीन यार, हम तुम और (सोडा-) ब्लागर ! लोग आराम से तहमद का पिछवाड़ा खजुआते हुये, उबासी लेते अल्ल्सुबह आयेंगे, नो टेंशन आफ़ करी करी न करी, दन्न से ये उठाया, वो कापी-पेस्ट । देखा रचना जी पर तो अभिव्यक्ति वाली माकूल रहेगी..खड़बड़ खड़बड़ । नहीं मिल रही है..फोन घुमाया, अरे डाक्टर साहब, अभी तो बिज़ी होंगे, अच्छा बताइये वो अभिव्यक्ति वाली खाली है, क्या ? हाँ हाँ वही, रंजू जी को बहुत पसंद है । अँय, नहीं है..कुश ने अभी लौटायी नहीं, अच्छा रोज़ ब्याज में नई टिप्पणी भेज देता है, लेकिन भाई डाक्टर साहब जरा देखिये इसको ? आप देख नहीं रहें हैं । अरे यहाँ टिप्पणियों की अदला बदली चल रही है..और आप बेख़बर हैं । कल नहीं तो शायद परसों..कुशजी उड़न तश्तरी की ‘ हा हा..हाहाहूती ‘वाली वह चेंप रहे थे, और ई उड़नतश्तरिया न, भाई का बतायें सीनियर होगये हैं , अउर ई सब काम करते हैं । भाई रोकिये इसको आप लोग, GB की मीटिंग में बवाल कर दूँगा हम । आखिर कोनो ईहाँ वोट-बैंक बनाने का पिलेट्फारम तो नहीं है, नू ? नाहिं नाहिं हमारा ऊ सब मानी मतलब नहिं था , मिसकोट मत करिये हमको । हमारा ग्रुपवा जानते तो अईसे बोलबे नहिं करते आप ! अब आप बताइये साहब…क्या आप भी बोलेंगे या कि बोलतिये बंद हो गयी है ? चलिये होता ई सब, लेकिन पूरा पढ़ें हैं कि ऎसे ही आगे बढ़ें हैं ? हम भी चलता हूँ शीव-भाई, नमस्कार !
सूचना : यह आलेख सद्यःप्रकाशित ‘ अमर कुमार के पत्र शिवकुमार के नाम ® ’ से साभार ली गयी है । © हलचल प्रकाशन, प्रयाग- 2008

मत पढ़िये इन ब्लाग्स कोटिप्पणी_करी करी न करीटिप्पणियों पर एक चिरकुट चिंतन ब्लागिंग एक चिरकुट चिंतन

इसका शीर्षक क्या हो सकता है , ?

हेरा-फेरी ठोंकि के एकु पोस्टिया तौ लिया बनाय, पाठक आपहू बाँचि कै शीर्षक दियो बताय । दो दिन से वाकई निट्ठल्ले से माहौल से दो-चार हो रहा हूँ, वज़ह—  अनवरत वर्षा ! बादल देख कर किसका मनमयूर न नाचता होगा, केवल हाइड्रोफोबिया का मरीज़ एक अपवाद है । लेकिन जब नाच नाच कर मनमयूर थक जाये, और भीगे पंख सुखाने को कोई ठौर न मिल न रहा हो, तो मनमयूर का सारा उल्लास हवा हो जाता है । दूसरे अपवाद फ़ुरसतिया गुरु दिख रहे हैं । बरसात पर बड़ी मस्त काव्य-पोस्ट ठोकी है । लेकिन हमारे जैसे दिहाड़ी पर मज़ूरी करने वाले से पूछो, महीने का पहला हफ़्ता…, पाँच – छः जन की सैलरी ( चलो, वेतन ही सही, आगे बढ़ें ? ) निकालनी है, ऎसे में मरीज़ों का आनाजाना ठप्प है, सो अलग ….

कल दोपहर को क्लिनिक से लौटते हुये ऊबा हुआ सा लौट रहा था, पेट्रोल की पोज़ीशन देखने की हिम्मत जुटाते जुटाते फिर टाल ही गया । आज छुट्टी है, कल रात से लगातार झिर्र-झिर्र लगी है । आज सुबह बरसात का मज़ा लेने के शगुन करने भर को दूर हाई-वे पर यादव के होटल तक जा उसकी प्रसिद्ध पकौड़ी खाने निकल गया । लौटने में पेट्रोल-मीटर की सूई पर निगाह गयी और यादवजी की पकौड़ी गले में आकर जैसे अटकने लगी ।

तेल अगर ऎसे ही हमारा तेल निकालता रहेगा.. तो कैसे चलेगा ?  शायद ऎसे ्तेरी दुनिया से दूर - अमर

ाखिर काम आ रही हार्स-पावर-अमर  रजिस्ट्रेसन करवाया है भाई - अमर  एक सवारी - अमर     

आख़िर फ़िज़िक्स ( भौतिकी ) में पढ़ी हुई  हार्स-पावर की महिमा दिखने लगी । घोड़े जी को लोग भुला बैठे, अब बुला रहे हैं । कुछ तो है.. जो कि ! वैज्ञानिक लोग बैलशक्ति, भैंसशक्ति या गदहाशक्ति को एक किनारे कर अश्व-शक्ति पर टिक गये । अब देखो, घोड़ा होता तो पेट्रोल की ज़रूरत ही कहाँ पड़ती ? अधिक से अधिक हर जगह पर घास-डिपो ही तो होते, घास की खपत इतनी बढ़ जाती कि हमारे लिये चरने को घास ही न बचती । घोड़े की सवारी की सवारी और लीद से बायोगैस बना कर रसोई गैस सिलिंडर के लिये लाइन न लगाना पड़ता । सो…मित्रों, अश्वम शरणम गच्छामि ॥

 ्पंछी बनूँ उड़ता फिरूँ - अमर निट्ठल्ला एक्सप्रेस - अमर डैशबोर्ड मेरी गाड़ी का - अमर

       चलो ऎसे ही उड़ो - अमर हवा में उड़ता जाये - अमर एक विकल्प यह भी - अमरकुमार