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निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है
सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा
अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक
शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक
बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ?
साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का
तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ
नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ
घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ
आकर जाने कब का चला भी गया
गिली गिली बूम पटाक हुर्र हुश्श छूः
प्रोणोब काकू ने सूँ चिड़िया उड़ा दिया
अब तो मरे भूखन भाय, तेखनोई गोलमगोल कोरता था, गेहूँ सेरे एक रुपिया तीन झुठलाय दिया,
मुझ सा बुद्धू ना जग में पाय
डाक्टर साहेब गयो खिसियाय
लौटे ब्लागर यों घर को आय
मूड़ निहोरे यह गुनगुनाय
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ममता ना बरसा पाया तू बजट्ट अली
निर्धन खेतिहर से दूर फटक मटक मटक
ऑय बजट्ट अली ऽऽ मैंऽऽऽऽय य य यीहः ऎ ऎ यीहः
यूँ मसल ना मेरीऽऽह तमन्ना
ज़मीं से जुड़ पर तू हमीं से टुर्र
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
पलट्ट ! ऒये पलट्ट जरा ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
दहा सफ़दरजँग के बाजू पीछे
दिखाती क्या ठेंगा तू क्या इस वज़ह से
कर मनमानी कर मनमानी मनमानी
पर बचियो ना कर यूँ तुम ये नादानी
होता ये मन सनाना नाना सनन साना रे
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
रा रारा रा रारा रारा रो
अबे रो बे... जरा सुर में रो
आँ आँ आँआँ आँ आँ आँआँऽऽऊँ
कितनी बार कहा कि सेन्टीमेन्टल हो न्यूज़ मत देखा करो,समाचार के सम-अचार का मसाला तुम्हें कभी से भी नहीं सूट किया करता है !
बड़े दिनों बाद पँडिताइन का दखल हुआ, पर इन्होंनें यह कैसे जाना कि गरीब देश की गरीब जनता के आँसू सूख चुके हैं ? इनका सरोकार तो कभी गैस चीनी दाल और वनस्पति तेल से ऊपर उठा ही नहीं ? रहस्यकम तात.. सूक्ष्मातिक्षूम रहस्यकम ! और यह भी कि, जनता अब पानी पीकर गुज़ारा करने पर ही मज़बूर है ? पानी भी यदि सुलभ हो जाये तब, क्योंकि उसके नेताओं के आँखों का पानी तो मर चुका है, बचा खुचा पानी वह चुनावी भाषणों में बहा-टपका चुके हैं ! रा रारा रा रारा रारा रो.





आजकल अपुन के मेल बाक्स में कोल्ड-ड्रिंक की लूट मची है ! मेरे ढाँचें का डाक्टरी वाला टेम्पलेट अँग्रेज़ी से भले बना हो, पर कंटेन्ट तो देसी रहेगा ! जैसे दूल्हे राजा का कितना भी ऋँगार कर देयो, उनका बाबू राजा बनाय के जयमाल के लिये ऊँची कुर्सी पर बईठाय देयो ! चारों तरफ़ फ़ोकस ही फ़ोकस.. जिज्जा जी, ही ही ही.. जीजाऽऽऽ जिही झी ही ही ही ! लेकिन जईसे ही जीजा का एकु मच्छर काटिस, बिलबिलाय गये.. अउर सीधै मच्छराइन बहन जी तक पहुँच गये, “ चटाक ! धात्त त्तेरी.. की .. .औंऽऽ ! “ औकात इसी को कहते होंगे, शायद ? 
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