8 September 2009
ने टाइम खोटी किया Tuesday, September 08, 2009 | 20 टिप्पणी | निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, फोटो सैटायर, बुरबकई
चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो
6 September 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, September 06, 2009 | 7 टिप्पणी | उनकी टिप्पणियों पर, तलाश है, बुरबकई, बेतक़ल्लुफ़, संदर्भहीन व्याख्यायें
माडरेशन की प्रतीक्षा में
इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी,
दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी ।
पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !"
दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?"
हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये ।
पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।"
दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?"
अब शर्त लगा ले.. और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी ।
किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है ?
जो हारेगा , आख़िर उसी को पैसा भी तो भरना पड़ेगा कि नहीं ?
बीस रूपये की शर्त लग गयी । अगर तू पेशाब में भीग गया तो बीस रूपये तेरे, वरना तुम्हें बीस रूपये देने पड़ेंगे । चल ठीक है, चल ठीक है ! पहला उसे कोने में ले गया, और उसके ऊपर झर झर मूत दिया । दूसरा सिर से पाँव तक तर हो गया ।
पर, वह खुशी से चीख उठा, " देखो देखो, मैं तो पूरा भीग गया ! "
जनता ने देखा, सबने देखा, हर आते जाते ने देखा और उसके पक्ष में खड़ी हो गयी, " भई तू शर्त हार गया है, चल इसे बीस रूपये दे ।" पहले ने कहा, " मैं कब कह रहा हूँ कि, मैं जीत गया ? यह ले अपने बीस रूपये ! " उपस्थित भीड़ ने मज़ा लिया और चले गये अपने अपने रास्ते ।
उनकी यारी न टूटी, शाम को दोनों अपनी रोज की तलब ख़ारिज़ करने को इकट्ठे हुये ।
दूसरे ने पूछा, " यार यह बता कि तुमने यह कैसे सोच लिया कि तेरी हरकत से मैं नहीं भीगूँगा ।"
पहले ने शाँति से ज़वाब दिया, " मैं जानता था कि तुम क्या कोई भी भीग जायेगा ।"
दूसरा चौंका, " फिर ? "
पहले ने कहा, " यार यह बता कि तुमको ताव दिलाया और इतना मज़मा इकट्ठा हो गया, और तू भी सराबोर हो गया कि नहीं ? " दूसरा हँसा, " इससे तुम्हें क्या फायदा हुआ ।"
पहले ने कहा कि, " फायदा नुकसान मैं नहीं जानता ।
तू यह बता कि बीस रूपये में यह डील क्या बुरी रही ? " ![]()
मैं जानता हूँ, भाई कि इस पोस्ट से लम्बी यह टिप्पणी सार्थक नहीं है, और यहाँ माडरेशन भी लगा है । फिर भी, इस साझा मँच पर एक पाठक के नाते अपनी निरर्थक बात भी कहने का अधिकार तो है, ही !
अब इस पहेली का हल सोचता हूँ । उत्तर सही लगेगा, तो टिप्पणी बक्से का दुबारा उपयोग करूँगा ।
आपकी टैगलाइन " इस ब्लॉग पर लिखी बातों का मेरी विचारधारा से मेल खाना आवश्यक नहीं है,यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं . अत: किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ! " से बल मिला सो साहसपूर्ण यह टिप्पणी चेंप रहा हूँ ।
30 August 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, August 30, 2009 | 19 टिप्पणी | चिट्ठाचर्चा संदर्भ, बेतक़ल्लुफ़, सँगी साथी
हिल्ले पठनीयता बहाने जन्मदिन
फ़िलहाल कुछ नहीं लिखने का मन था । अब तो एक धड़का और लग गया है, पठनीयता का ! भला बताइये, आपका निट्ठल्ला अपने टैग को सार्थक करने कहाँ जाये ? मेरी पठनीयता बिन सोचे ही आती है !
इधर उधर से पोस्ट उधार ले लेकर अच्छा ख़ासा ब्लाग-यापन कर रहा था । इतने में लिखने की यह मज़बूरी मुझ पर टूट पड़ी । सो, पठनीयता सिद्धाँत की सादर अवहेलना करते हुये, अपने कम्प्यूटर का कीबोर्ड खटखटा रहा हूँ । देखो, क्या निकलता है ? पढ़ ले, बाद में पछतायेगा, अबहिन झेल सके तो झेल ।
हाँ तो, सुना किया कि आज जन्मदिन है । सकल जग में नित नये प्राणी जनमते हैं, और एक सूर्योदय से अगली सुबह तक दिन में शुमार होता है । बोले तो हर तारीख़ जन्म दिनों से अटी और फटी पड़ रही है ! लेकिन मेरा निवेदन है कि इसे आप बँधुओं ने नाहक ही कुछ ख़ास बना दिया । जनश्रुति है कि मेरा जन्म आज के दिन हुआ था । जब जनश्रुति है, तो मानना ही पड़ेगा.. काहे से कि जनश्रुतियाँ प्रमाण की मोहताज़ नहीं हुआ करतीं । कौव्वा कान ले गया, तो मान लीजिये कि ले ही गया होगा, आख़िर इत्ते जन झूठ बोल कर अपने को उससे कटवाने का रिस्क क्यों लेंगे ? तो, यह मान लेने में कोई बुराई नहीं दिखती कि आजै हम जन्मे थे । ब्लागर शोधार्थी इसे बुकमार्क करें कि, इस महान निट्ठल्ली विभूति का जन्म सँभवतः आज ही के दिन ( पढ़ें रात ) हुआ था ! जरा प्रेम से बजाइये तालियाँ... या खटखटा ही दीजिये कुछ स्माइलियाँ !
अब पूछिये कि, सँभवतः काहे ? सँभवतः इस करके कि, जैसी कि परम्परा है हर महान विभूति ( निट्ठल्ली हुई तो क्या ) का जन्मदिन और जन्मस्थान विवादों में रहता आया है । तऽ हम्मर जनम के ठाम छई दरभँगा ! ओफ़्फ़ोह, ई मैथिली तू कहाँ ठँसी चली आ रही है, बबुनी ? द्वार-भँगा = दरभँगा = और लीजिये हम जनम गये ! जन्म दिन को लेकर अलबत्ता कुछ विवाद है । जन्मदिन के विवाद की सुनवाई जारी है, और मेरे जीते जी तो यह सुलटने वाला नहीं दिखता । यदि विवाद सुलटाने के लिये ही खड़े किये जायें, तो वह विवाद किस काम का ? इसे चलते रहना चाहिये, कुछ शोधार्थी अपनी थीसिस सेंक लेंगे, व रोजी पायेंगे !
उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर मेरा जन्म दिन एक जुलाई को ठहराया गया है । अभिलेख तो आख़िर अभिलेख ही होते हैं, इन पर डाउट नहीं किया जा सकता । इनमें जान है, यह जिसको चाहें मृतक घोषित कर दें और यदि चाहें तो, किसी भी मृतक को आजीवन पेन्शन का हक़दार बना दें । फिलहाल तो मेरा हाई स्कूल ( वह भी किया है, भाई ) का सार्टीफिकेट और एम.सी.आई. पँजीकरण तो यही प्रमाणित करता है कि एक जुलाई सन उन्नीस सौ दहाई इकाई को मेरा जन्म हुआ था । सो इवेन, आलमाइटी कान्ट चैलेन्ज़ इट, स्साला ! मुझे तो लगता है कि, इस नश्वर सँसार में ईश्वर के बाद कुछ भी सत्य है, तो वह अभिलेख है, अभिलेख ही है, अभिलेख ही है । बस यूँ समझिये कि जाको कृपा पँगु गिरि लाँघें के बाद ” जाकौ लिक्खा मरा पिन्शन पावै ’ की ताकत ही दुनिया चला रही है । जी, मैं अमर कुमार.. ठीक है ठीक है, लाइये कागज़ दिखाइये । गोया क़ागज़ न दिखाया तो मैं समीर लाल में गिन लिया जाऊँगा, मैं तो पूरा भी न पड़ूँगा, भगवन ! न जाने हमारे वँश के किस पुण्यात्मा ने चित्रगुप्त के लेखे में यह हेराफेरी कर दी ? उन बुज़ुर्ग बेचारे ने भरसक अपनी लाला बुद्धि ही लगाई होगी कि, बड़ा होकर बाबू किरानी ही बनेगा तो सर्विसबुक बनाने वाले को आसानी होगी । ईश्वर उनकी आत्मा को क्रीमी लेयर में बख़्शे । शायद इसी बहाने मैं बिना प्रयास डाक्टर बन सका, क्योंकि एक जुलाई डाक्टर्स डे है, हमारा दिन !
उधर मेरी अम्मा का दावा है कि, उनकी गणना के अनुसार मेरी जन्मतिथि हमेशा से 29 अगस्त ही है । उनके वर्णन के अनुसार, वह भादों की एक भयानक अँधेरी रात थी, तेज अँधड़ के साथ लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी । उन्हें ठीक से याद नहीं कि बिजली कड़की भी थी या नहीं, पर उसी रात मेरा जन्म हुआ, यह तो उन्हें पक्की तरह याद है । वह यह भी सनद देती हैं कि, मेरे जन्म की ख़बर सुनते ही सिनेमा ( प्रोजेक्टर ) आपरेटर चाचा जी झूम उठे, और स्क्रीन पर ’ आग ’ चलती हुई छोड़ छाड़, घर को भाग खड़े हुये । इस नाच कूद में रेलवे लाइन पर अपना एक पैर चोटिहल कर बैठे, और इसके साथ ही उतनी रात में दुकान खुलवा कर पेड़ा लाने का उनका गुमान स्लीपरों पर बिखर गया वह अलग ! फलतः मुझ वस्त्रहीन बालक के ’ केहाँव केहाँव ’ में उनकी ’ हाय हाय’ के आर्तनाद ने अनोखी सँगत दी, बरसात का पार्श्वसँगीत तो पहले से ही था । कुछ सुनगुन मची, और पड़ोस के पँडित जी को तत्काल सूचना भेजी गयी कि वह फौरन लालटेन जला कर गणना करें कि जातक मूल का है या ब्याज़ में मिला है ? उनींदे पँडित जी ने जम्हुआते हुये डिक्लेयर किया कि यदुनाथ सिन्हा अगर ज़िन्दा बचें हैं, तो इसी बालक के पैर लक्षण से , काहे कि ठीक अढ़ाई मिनट बाद उस लाइन से समस्तीपुर सटल पास की है
जननी से बड़ा भी कोई साक्ष्य होता है, क्या ? सो, यह तय समझिये कि, ख़ाक़सार भादों की उपज है, यानि अगस्त, द 29, सन ( अभी तय नहीं ), क्योंकि मेरी माताश्री अपनी अनोखी रिवर्स मैथमेटिक्स से इसमें हर साल एक वर्ष की घटतौली कर देती हैं । मसलन पिछले वर्ष यदि मैं सन 1954 में पैदा हुआ था, तो इस वर्ष यह 1955 हो जायेगा, बल्कि हो चुका है । आपलोग क्या इतना भी नहीं समझते कि, 54 के बाद 55 ! शायद इसी बहाने वह अपनी उम्र में साल दर साल एक एक वर्ष कम करते हुये, श्री चित्रगुप्त महाराज की आँखों में धूल झोंकती आ रही हैं । कौन मरदूद कहता है कि, ज़िन्दगी में आगे बढ़ने को पढ़ना ज़रूरी है ?
यह तो हर आम और ख़ास ब्लागर ने सुना ही होगा कि, “ गये थे ब्लागलेखन को, विवाद गले पड़ गयी !” बल्कि अपुन की हिन्दी ब्लागिंग में यह तो अनुभवसिक्त एवँ स्वयँसिद्ध सूत्र है कि,” आये थे पठन पाठन को , घोटन लगे विवाद ! “ निट्ठल्ला भला अपवाद क्यों रहे, अपने सँग विवादित जन्मतिथि ले आया
बात अभी ख़त्म नहीं हुई है ( शब्द सँख्या 3616, और समय सायँ के 11.34 PM ) , इस विवाद को अभी और तूल पकड़ना बाकी है ! हमारे ब्लागजगत में यूँ तो कई भाई हैं, पर एक भाई ऎसा भी है, जो अकेला सभी पर भारी पड़ता है । उनके डील डौल की बातें तो खैर अभी जाने ही दीजिये, काले चश्में में उनके तेवरिया पोज़ का फोटो देख हर अदना-फदना ब्लागर स्वतः ही उन्हें भाई मान लेता है । अपने चार्टर्ड यू.एफ़.ओ. की वज़ह से वह सभी की ईर्ष्या का पात्र भी हैं, पर बोलता कोई नहीं । तो, भाई भिनसारे ही आकर मेरे आर्कुट की स्क्रैपबुक छेंक लिये, बोले “ आज आपका जन्मदिन है । जन्मदिन की बधाई हो ! “ मैंने फौरन ही अपना टास्कबार ताड़ा, 28 Aug AM 7:18:11, Friday ! इन भाई से कौन से भिड़े ?
चलो छोड़ो, जरा घूम टहल कर आते हैं, फिर इनसे पूछूँगा, “ आपकी घड़ी बहुत फ़ास्ट चलेली है, भाई ? “ पर उन्होंने अवसर ही न दिया । इस बार टिप्पणी बक्से में प्रकट होते भये, और फिर वही, “ आज आपका जन्मदिन है । जन्मदिन की बहुत बहुत बधाईयाँ और शुभकामनायें !“ यह देख हम पड़ गये तरद्दुद पेशोपेश में, लिहाज़ करता हूँ तो मेरे पैदा होने की 28 अगस्त, एक नयी तारीख़ पैदा हुई जाती है, अगर कुछ ज़वाब भेजता हूँ तो बी.पी. ( उनका ) हाई होने को धमकाता है । फोन नम्बर भी नहीं है ! टिप्पणी बक्सा थोड़ा हरकत में आया और, एक अदद “ जय हो ! जन्मदिन मुबारक हो ” चमकने लगा । यह भाई के सरकिट तो नहीं, बल्कि अपने फ़ुरसतिया थे । लगता है, पूरा इंतज़ाम रहा, उनके ठीक पीछे ज़नाब वकील साहब पँडित दिनेशराय द्विवेदी भी गवाही में लगे थे ! आपका वकील ही गवाह बन जाये,तो बोल हरि गँगा !
तो श्रीमँत, मैं अपने तीन तीन जन्मदिन लेकर कहाँ जाऊँ ? सुना था कि, देख छिनरो के तीन तीन भतार ! पर यहाँ तो तीन जन्मदिन दावा ठोंके पड़े हैं । कहीं मी लार्ड ने केस ख़ारिज़ कर दिया, तो फिर यही होगा कि मैं पैदा ही नहीं हुआ था। मैंने बोला था न कि अभिलेख बोलते हैं, सुनिये,”आप कतार में हैं, यानि मैं ? “
पँडिताइन से कहा तो चमक पड़ीं, “ और गाँज़ाखोरों की सँगत करो !“ ऎई, गलत बात बोलियो मति, इसमें अपुन के भाई इन्वाल्व हैं, मैं तमक गया । पलट गयी तिरिया, अम्मा से नज़रें बचाकर और आँखें घुमाय के गुनगुनाय दिहिन, “ सज रही गल्ली तोरी माँऽऽआँ, चूनर गोटे में.. ऎं ऎं,” और ये ये येह्ह फटाक ! मेरे चेहरे के पास लपक कर बजती है एक ताली ! हैप्पी बड्डडे, हाँज्जि ! ऒऎ थैंक यू, शैंक यू.. हाँज्जि !
भला होवे पाबला प्राजी नूँ होर पुत्तर कुश दा ते एनाउँस कित्ते के साड्डा खालस बड्डे उन्तीह अगस्त हाँ !
23 August 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, August 23, 2009 | 16 टिप्पणी | कार्टून एडिटिंग, बुरबकई, सँगी साथी
चले जाना नहीं, होश उड़ाय के
मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले कुछ वर्षों से छिटपुट स्तर पर सक्रिय हो पाये हैं । कल्पना के धनी हैं, फिर भी शायद सौजन्यवश मुझसे भी कार्टून आइडिया की माँग कर बैठते हैं । और उसे पूरा भी करते हैं । प्रस्तुत है, उनके द्वारा रेखाँकित यह बानगी !
बहुधा यह सुनने में आता है, कि कुछ लेन-देन के मसलों को लेकर मरीज़ आपरेशन टेबल से वापस आ जाता है, यह कटाक्ष उधर ही है । यदि कोई आहत होता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी पर मनमर्ज़ी अनुसार आहत होने को पूर्णतया स्वतँत्र है । मूर्छा सुँघाय के, होश उड़ाय कैऽ,चले नहीं जाना… ओ डाक्टर बेदर्दी !
मित्रोऽह् भवन्तु सुखिन्ः सर्वो भ्रूयात् शुभम् ! इति निट्ठलस्य् प्रगल्भम् ॥
2 August 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, August 02, 2009 | 16 टिप्पणी | चिट्ठाचर्चा संदर्भ, बेतक़ल्लुफ़, सँगी साथी
मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?
समीर भाई टिप्पणीशाह लालउड़नतश्तरीवाला कुछ लिखें, और हम कन्फ़्यूज़ियायें भी न ? ऎसा कम ही होता है.. ज़रूर कहीं कोई निहितार्थ रहा करता है । चतुर सुजान ऎंवेंई ही टाइम खोटी नहीं किया करते.. कुछेक जन ही ऎसे हैं, जिनकी पोस्ट मैं सहेज कर रख छोड़ता हूँ.. और बाद में उसे फूँक फूँक कर चौकन्नी निगाहों से पढ़ता हूँ । खैर.. उनकी विरुदावली चिट्ठाचर्चा समेत कई ब्लाग पर आ चुकी है, सो यह मेरा मकसद भी नहीं है । आज वह अपने उच्च रक्तचाप को लेकर बिसूरते पाये गये.. साथ में मोटापे पर भी सैकड़ों लानते भेज डाले । मुझे लगा कि मैं एक मोटी सलाह दे ही डालूँ.. तीन ’री’ से बचें.. आराम में रहेंगे, हरी ( Hurry ) वरी ( Worry ) और करी ( Curry ) ! सोचा तो सही, पर ठिठक गया कि वह उड़नतश्तरी के टेल से री उड़ाकर किस हैंगर में पार्क करेंगे ? मोटापे पर क्या कहता.. यह तो ग़ुज़रे ज़माने की मेरी भी आपबीती रही है, कभी लिखा भी था ! फिर इसी को समेटने की इच्छा तो है..पर, टैम कहाँ है रे ?
मेडिकल कालेज़ में मेरे सहपाठी मित्र खुर्ज़ा के एक शर्मा जी हुआ करते थे.. बड़े मौज़ी और... बड़े ही घिस्सू ! अगर वह केला ले रहे होते, तो पूछते केले कितने के ? हम छात्र लोग यूँ तो फल-वल पर पैसे जाया नहीं किया करते थे, दर्ज़न किलो लेना तो दूर की बात ! फलवाले का ज़वाब," एक रूपये का एक !" अमें इत्ते में तो कैप्सटन की डिब्बी आ जायेगी, ठीक बताओ.. पचास पैसे में दोगे ? फलवाला पिंड छुड़ाने को आज़िज़ी से तमक पड़ता, " पचास पैसे में तो छिल्का भी न मिलेगा ।" शर्माजी बिना विचलित हुये तपाक से कहते, " ठीक है, यह ले पचास पैसे और केला दे दे, छिल्का तो भाई तू ही रख लीज़ो ।" फिर स्वयँ ही बेशर्म हँसी का लबादा ओढ़ लेते..." हा हा हा.. खी खी.. ऊहू ऊ ! " आज उनको याद करते हुये यह आधे रेट की घटे दरों पर बेशर्म पोस्ट दे रहा हूँ, हा हा हा.. खी खी.. ऊहू ऊ ! यूँ तो.. किसी चुके हुये रियासत के शस्त्रागार सरीखे अपने ब्लाग आरकाइव से निकाल कर ऎसी पुरानी पोस्टें बार बार भाँजने की अपनी आदत तो है नहीं, फिर भी.. उन दिनों मैं परेशान रहा करता था कि मैं मोटा क्यूँ हूँ ? बाद में तो ख़ैर .. उसका ज़वाब भी मिल गया ! उत्सुकता हो रही है ? पर वह सब बातें बाद में
लेकिन बिरादर, उन दिनों होंठों पर बस यही रहा करता था, “ मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ? मैं मोटा हूँ हूँ.. मैं हीं हीं हूँ हूँ.. हैं होंटा हूँ हूँऽऽ, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता था.. हैं होंटा हूँ हूँऽऽ । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम चलाना ही कहूँगा, मज़बूरी थी । अपने चाणक्य बाबा मलेच्छ भाषा में कह गये हैं, Offence is the best Defence ! सो उनका अनुसरण करते हुये, दूसरों के हँसने से पहले स्वयं ही गाने लगो । अब अगला भला क्या खाकर किसी छिनरो का भतार छीनेगा ? ग़र छीन सकते हों, तो पहले इनका भी कुछ छीन कर दिखाओ ? मैं मोटा क्यों, हूँह !
यह मैं नहीं.. मैन्यूल है, बोले तो बेचारा मोटापे का ज़हे-नसीब फिज़िशियन सैम्पल !
सौजन्य: यू-ट्यूब इंडिया एवँ टाइम्स आनलाइन डाट काम
अरे, कोई पूछ भी लो कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? छोड़ो, मैं स्वयं ही बेशर्म नेताओं की तरह अपना स्पष्टीकरण दिये देता हूँ । दरअसल पिछले दिनों मेरा वज़न अचानक बढ़्ने लग पड़ा । 68 किलो के सदाबहार देवानंद, शनैः शनैः उत्सव के अमज़द खान की तरह होने लगा, कोई कहता कि आप पचपन के नहीं लगते तो मैं लक्का कबूतर सा गरदन नचा कर कहता, " यह तो पचपन का बचपन है, यार ! " किंतु पता नहीं कौन सी टेलीपैथी हुयी कि जिस दिन मेरी पंडिताइन ने श्री ज्ञानदत्त जी का फोटू देख कर कहा,” अरे, यह तो तुम्हारे उम्र के ही हैं ? बस थोड़े हेल्दी हैं ! खासे भोले लगते हैं !” बस्स यारों, समझो उसी दिन मेरी फ़ुरसत हो गयी । दूसरे का ख़सम.. ठहरा भोला, और अपना निजी पति हुआ तो भोंदू ? उन दिनों हमारी गृहस्थी में, ज्ञानदत्त जी का बोलबाला था.. वह मेरी पोस्टों के सोलो शोमैन यानि टिप्पणीकार थे । आख़िर यह ज़नानियाँ दूसरों के पति से अपने की तुलना ही क्यों किया करती हैं ? उसके वो हमारे इनसे मोटे हैं, हमारे ये उ्सके आदमी से तो लाखगुना अच्छे हैं, गोया आदमी न हो गया नये फ़ैशन का कपड़ा होगया । इतराती हुई बलखाती हुई बोलेंगी,” बहुत जतन किये हैं, इन हाथों नें इनकी ऎसी की तैसी देखभाल करने में ! रचना जी आप यह पोस्ट पढ़ रही हैं, कुछ ठीक ठाक माहौल लग रहा है, यहाँ ? हाँ तो, जरा हमारे पाठकों को यह बतायेंगी कि ऎसा क्यों सोचा जाता है ? और यह कि महिलाओं की गोष्ठियों में पतियों का तुलनात्मक अध्ययन/ परिचर्चा ही क्यों अनिवार्य हुआ करती है ? हाँ तो ....
मैं चिढ़ जाता हूँ, ऎसी तुलनाओं से ! अरे, तुम तो दिन में दस बार, जब मर्ज़ी आया पति को धोकर टाँग देती हो । चलो, इसे मुहब्बत करने का सितम मान लेते हैं ( और चारा भी क्या है ? अपुन का चारा -पानी डिपार्टमेन्ट भी तो इन्हीं के पास ठहरा ), सो सब सिर आँखों मंज़ूर ! लेकिन क्या ज़रूरी है, गैरपुरुषों पर टीका टिप्पणी करना ? क्यों जताता हैं, इन चोखेरवालियों का पोस्ट कांटेन्ट, कि आपको सर्फ़ एक्सेल से सहेज़ना है, या घड़ी डिटरज़ेन्ट से रगड़े जाने की ज़रूरत है ?
सो, अपने श्रीमान गुरु जी के मोटा कहे जाने पर मेरा क्लेश क्रोध बन कर, अपनी नवी नवी कलहप्रिया पर फूट न सका .. फलतः अपने गुरुवर ने शाप-वेव्स को ट्राँसमिट कर दिया हो । । वैशाख के गदहे की तरह मैं दिनोंदिन अनायास मोटा होने लगा । मित्रों की भ्रुकुटियाँ व्यंगात्मक तंज़ में चौड़ी होने लगीं । मैं बेचारा क्या कहता, दस वर्षों से तो मेन्टेन कर रहा हूँ । दही, मट्ठा, छाछ, सत्तू का शरबत, ढेरों फल व ब्लैक काफ़ी पर दिन गुज़रता है, रात में भोजन के नाम पर चिड़िया का चुग्गा व सवासेर सब्ज़ी ! बीच में यदि कभी ज़रूरत हुयी तो गुड़-चूड़ा या लाई-चना से खिसिया कर तृप्त हो लेता हूँ, अब मोटा हो रहा हूँ तो क्या प्राण तज दूँ ?
सलाहें आने लगीं... नियति मुस्कुराने लगी... पंडिताइन गुर्राने लगीं... " मार्निंग वाक पर जाओ, कल से ! " मैं जनम जन्माँतर का निशाचर, एकदम काँप गया । 'हाय भगवान, मैंने तो कितनों को अब तक टहला दिया, अब तुम मुझे टहलाने जा रहे हो ?' अपनी फ़ीस ज़ेब के हवाले कर, मरीज़ों को टहलाना तो मेरे पेशे की ज़रूरत है । न टहलाऊँ तो बाबा रामदेव उनको हँका ले जायेंगे । अब तुम मुझे तो न टहलाओ, दीनबंधु दीनानाथ ! यह भला क्यों सुनें ? वैसे भी हाइटेक बाबाओं ने उनको फ़ुसला लिया है, वह वहीं सुगंधित वातावरण में डोलते हैं । लिहाज़ा टहलने की सज़ा की तारीख़ तक तय हो गयी । पहली सुबह, एलार्म बज पड़ा । माई कसम, अपना न होता तो, बाहर फेंक देता । नहीं फेंक पाया..
और वह मेरे कानों में किर्राती रही । किर्राओ, जितना किर्राना है, हम न उठेंगे । पंडिताइन का प्रवेश..,” उठो यार, पहले दिन ही मक्कारी कर रहे हो ?” तुम भी चलो, मैंने शो करवाना चाहा । नहीं नहीं तुम जाओ, मुझे कितना काम है, वह कौन करेगा ? महरी आने वाली होगी, उसके लिये चाय कौन बनायेगा ? तुम जाओ.. तुम्हें ज़्यादा ज़रूरी है । कहीं कुछ हो हवा गया, तो मैं क्या करूँगी ? लो जी, मेरे स्वास्थ्य में भी इनका एक अर्थशास्त्र छिपा है । मज़बूरी का दूसरा नाम मिडिल क्लास आदमी है, देख लीजिये यहाँ ! “चल्लो..उट्ठो, दिन भर बैठे रहते हो ।” क्लिनिक, कार, कम्प्यूटर भला खड़े होकर भी चलाई जा सकती है ? इस नादान को कौन समझाये ? इतने में एकतरफ़ा फाइनल वर्डिक्ट भी आ गया,” जाओ कम से कम ओवरब्रिज़ तक तो हो आओ ।” मैं पड़ा पड़ा दार्शनिक हो गया, ' नारी तेरे रूप अनेक ' रात में तो प्राणप्यारी लग रही थीं, अब इस समय क्यों जलवा-ए- प्राणहत्यारी बिखेर रही हो ? कसम दे देकर एक कटोरी एक्स्ट्रा खीर दी थी, अब पद्दी पदाने पर आमदा ! खैर, जो न होना चाहिये था, वह होकर रहा । मुझे घर से निकलना ही पड़ा । धकियाया गया, पैर घसीटते हुये बेआबरू से चल पड़े, जायें तो जायें कहाँ ?
अज़ब गज़ब नज़ारा, लगता था पूरे शहर के बेडौल डील डौल वालों की कोई रैली चल रही हो । उचकते, भचकते सभी भागे जा रहे हैं, उत्तर को ! नज़रें चुराते हुये हम भी शामिल हो लिये, इस अनोखे कारवाँ में । कुछ शिकारी निगाहों ने मुझे ताड़ लिया, पीछे लग लिये, डाक्टर साहब, इस डायबिटीज़ में बेल का शरबत लेना चाहिये.. अच्छा अच्छा.. और जी वह हरा वाला कद्दू ? अबे कद्दू तो तू खुद ही लग रहा है, अब तू किस कद्दू को खायेगा ? पर बोला नहीं,क़ोफ़्त होने लगी
सुबह की अपनी अच्छी खासी तरो-ताज़ा खोपड़ी कई जगह चटवाते, नुचवाते, सरकारें बनवाते गिरवाते , अंत में उनके हिसाब से मंत्रिमंडल में फेरबदल करवा कर ही घर लौटा । पंडिताइन के आशा के विपरीत, मैं चहकते हुये घर में दाखिल हुआ । पंडिताइन भौंचक, फिर सहसा पैंतरा बदल, वह भी राग हर्षित में संगत देने लगीं, देखा ! एक ही दिन में कितना फ़र्क़ पड़ गया । साँस अँदर जाने में जैसे अकड़ रही है, ये हैं कि " हुँह, कीतना फरक पर गिआ ? " बोला कुछ नहीं, कुछ न बोलो तो बीबी की परेशानी का कोई ओर-छोर नहीं मिलता ( आप भी यह मंतर आज मुझसे मोफ़त में लेलो ), मैं तो अपनी अन्य उपलब्धियों पर झूम रहा था, शहर के बहुत सारे सहतोंदू भाई एक साथ, इस अवसर पर मिले … किबला तोंदू तो मैं भी हूँ, तभी तो इन गणमान्यों को सहतोंदू कह रहा हूँ । इन सहतोंदुओं में, अपनी गिरफ़्त में आने वाले कई को चिन्हित किया, और उनसे अतिप्रेम से मिला । अब यह समझो कि प्रैक्टिस में, कुछ नहीं तो 15% का इज़ाफ़ा तो कहीं गया नहीं है । इतना पब्लिक रिलेशनशिप और नेटवर्किंग तो ब्लागर से सीख ही लिया है !
मुझसे कोई उचित रिस्पांस न पाकर पंडिताइन अपने में व्यस्त हो गयीं । अंदर शायद किसी से फोन पर बात हो रही थी, “ हाँ हाँ, हाँ हाँ हैं ! हाँ घर में ही हैं, अभी अभी वाक कर के लौटे हैं, थोड़ा (?) रिलैक्स हो रहे हैं । मैं बता दूँगी, वह 8 बजे तक ख़ुद ही बात कर लेंगे । जी अच्छा, जी अच्छा, नमस्कार !” अरे ! यह तो एक दूसरे तरह की उपलब्धि हाथ में आ गयी, ' अभी अभी वाक कर के लौटे हैं ' इतना बोलने में ही उनका दर्प इस कदर टपक रहा था कि मानो मेरे जैसी शूरता शायद ही किसी मर्द के बच्चे ने दिखायी हो । अब तो शाम तक मेरा पूरा समाज़, मेरी इस वाकिंग मर्दानगी से वाक़िफ़ हो जायेगा, बड़ा तेज चैनल है इनका । सीना चौड़ा कर के चाय के इंतज़ार में बैठ गया । लेकिन यार, यह तो जीत रही हैं … अब क्या किया जाये, भला ?
आगमन पंडिताइन का, और सुनाओ, कैसी रही आज की वाक ? मेरा प्रत्युत्तर “ अरे एकदम मूड फ़्रेश होगया । “ अंबेदकर वाले मोड़ पर ही मिसेज़ खन्ना मिल गयीं, ग़ज़्ज़ब है भाई.. ज्यों की त्यों रक्खी हैं, पिछले दस साल से ! एकदम छोकरी लगती है, यह मंजुलवा ! बहुत देर तक उससे बातें होती रहीं, कहने लगीं कि वह अपने फ़िगर के लिये कुछ भी कर सकती हैं, बुरा न मानो तुम तो उसकी ताई लगने लगी हो । लौटते में वह गर्ग साहब की वाइफ़, अरे.. वो आईटीआई वाले, जो मंटू की शादी में झूम झूम कर नाच रही थी, हाँ वही मिली । उस दिन तो मैं भी चक्कर खा गया कि इस उम्र में भी यह लचक, भाई कमाल की चीज है, उसकी कमर....कभी उसको चूड़ीदार में देखा है ? आज वह चूड़ीदार में थी !
मेरी बात पूरी ही कहाँ होने पायी, पंडिताइन के चेहरे से धुँआ उड़ता दिखायी देने लगा, साथ ही कुछ ज़नानी टाइप बारूद की गंध भी … । अचानक फट ही तो पड़ीं, कब बंद होगी तुम्हारी लम्पटई ? बेटी जवान हो रही है, और तुम सुबह सुबह अपने औरतबाजी के कारनामे मुझे सुना सुना कर रस ले रहे हो । हद हो गयी बेशर्मी की ! हाँफते हुये आगे बढ़ते बढ़ते, पलट कर फिर एक वार किया, आख़िर कब सुधरोगे ? सुधरोगे भी कि नहीं ? कोई ज़रूरत नहीं है, कल से कहीं जाने की ! जो करना हो घर में करो । चलो अमर कुमार, अपना काम तो बन गया । अब इनसे पूछूँगा,' घर में करना क्या है, एक्सरसाइज़ या औरतबाजी ? काँटे से काँटा तो निकल गया, लेकिन मेरा बहत्तर किलो किस घाट लगेगा ? खैर, निदान मिल गया । आख़िर बेमन की डाक्टरी पढ़ाई का कुछ बचा खुचा हुआ ही काम आया ।
संभावित कारणों की पड़ताल में, थायरायड महाशय दोषी पाये गये । टेस्ट में कामचोरी करते रंगेहाथों पकड़े गये । यानि हाइपोथायराडिज़्म ! बस एक गोली का सवाल है, वह ले रहा हूँ । इस पोस्ट की अँतिम लाइन लिखने तक वज़न 68.5 कि०ग्रा० है ! बाकी तफ़सील बाद में.. अभी टैम नहीं रहा, सो, इतना ही लिख सका । तो मित्रों, जैसे मेरे दिन बहुरे, आप लोग दुआ करें कि, वैसे ही समीर भाई के भी बहुरें । इन्हीं सद्कामनाओं के साथ, मेरा नमस्कार !
29 July 2009
ने टाइम खोटी किया Wednesday, July 29, 2009 | 12 टिप्पणी | निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, बुरबकई, बेतक़ल्लुफ़
भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो
पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई !
चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू
ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक... त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक ।
बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू
आजकल बड़ा बूझा और बुझाया जा रहा है, सोचा निट्ठल्ले बैईठ से तो अच्छा है कि, हमहूँ कुछौ बूझि जाँचि लेयी.. कल हो ना हो ! वो क्या है कि,
कहते हैं ना ..यह ब्लागर की बस्ती है..यहाँ पोस्ट मँहगी और टिप्पणियाँ सस्ती है । सो, अँतरिम राहत के लिये एक सस्ते दरों का पोस्ट दिया जा रहा है, निर्वाह कीजिये ।
यह ख़ानम बीते हुये ज़माने की खँडहर नहीं, क्योंकि यह स्वयँ ही कहती हैं कि, " मैं तो नब्बे वर्ष की ज़वान हूँ ! " अपने को भारत का प्रथम ’ न जानि क्या कुछ ’ बताती हैं । इनका नाम है.. उड़ी बाबा, ज़वाब तो आपको देना है । ज्ञानियों के तरकश तो तीरों से ख़ाली हो चुके हैं, इसलिये यहाँ अज्ञानियों का तुक्का भी बिना किसी मर्डरेशन के चलेगा । ज़रूरत बस इतनी ही है कि, चलाइये तो सही ?
7 July 2009
ने टाइम खोटी किया Tuesday, July 07, 2009 | 17 टिप्पणी | कवितायें, बुरबकई, बेतक़ल्लुफ़
हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली
निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है
सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा
अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक
शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक
बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ?
साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का
तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ
नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ
घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ
आकर जाने कब का चला भी गया
गिली गिली बूम पटाक हुर्र हुश्श छूः
प्रोणोब काकू ने सूँ चिड़िया उड़ा दिया
अब तो मरे भूखन भाय, तेखनोई गोलमगोल कोरता था, गेहूँ सेरे एक रुपिया तीन झुठलाय दिया,
मुझ सा बुद्धू ना जग में पाय
डाक्टर साहेब गयो खिसियाय
लौटे ब्लागर यों घर को आय
मूड़ निहोरे यह गुनगुनाय
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ममता ना बरसा पाया तू बजट्ट अली
निर्धन खेतिहर से दूर फटक मटक मटक
ऑय बजट्ट अली ऽऽ मैंऽऽऽऽय य य यीहः ऎ ऎ यीहः
यूँ मसल ना मेरीऽऽह तमन्ना
ज़मीं से जुड़ पर तू हमीं से टुर्र
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
पलट्ट ! ऒये पलट्ट जरा ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
दहा सफ़दरजँग के बाजू पीछे
दिखाती क्या ठेंगा तू क्या इस वज़ह से
कर मनमानी कर मनमानी मनमानी
पर बचियो ना कर यूँ तुम ये नादानी
होता ये मन सनाना नाना सनन साना रे
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
रा रारा रा रारा रारा रो
अबे रो बे... जरा सुर में रो
आँ आँ आँआँ आँ आँ आँआँऽऽऊँ
कितनी बार कहा कि सेन्टीमेन्टल हो न्यूज़ मत देखा करो,समाचार के सम-अचार का मसाला तुम्हें कभी से भी नहीं सूट किया करता है !
बड़े दिनों बाद पँडिताइन का दखल हुआ, पर इन्होंनें यह कैसे जाना कि गरीब देश की गरीब जनता के आँसू सूख चुके हैं ? इनका सरोकार तो कभी गैस चीनी दाल और वनस्पति तेल से ऊपर उठा ही नहीं ? रहस्यकम तात.. सूक्ष्मातिक्षूम रहस्यकम ! और यह भी कि, जनता अब पानी पीकर गुज़ारा करने पर ही मज़बूर है ? पानी भी यदि सुलभ हो जाये तब, क्योंकि उसके नेताओं के आँखों का पानी तो मर चुका है, बचा खुचा पानी वह चुनावी भाषणों में बहा-टपका चुके हैं ! रा रारा रा रारा रारा रो.
21 June 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, June 21, 2009 | 13 टिप्पणी | बेतक़ल्लुफ़, सँगी साथी, संदर्भहीन व्याख्यायें
Amar Kumar has sent you a cold drink
पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के चले आये हैं, तो यह ब्ला ब्ला ब्लाग भी झेलिये..
आजकल अपुन के मेल बाक्स में कोल्ड-ड्रिंक की लूट मची है ! मेरे ढाँचें का डाक्टरी वाला टेम्पलेट अँग्रेज़ी से भले बना हो, पर कंटेन्ट तो देसी रहेगा ! जैसे दूल्हे राजा का कितना भी ऋँगार कर देयो, उनका बाबू राजा बनाय के जयमाल के लिये ऊँची कुर्सी पर बईठाय देयो ! चारों तरफ़ फ़ोकस ही फ़ोकस.. जिज्जा जी, ही ही ही.. जीजाऽऽऽ जिही झी ही ही ही ! लेकिन जईसे ही जीजा का एकु मच्छर काटिस, बिलबिलाय गये.. अउर सीधै मच्छराइन बहन जी तक पहुँच गये, “ चटाक ! धात्त त्तेरी.. की .. .औंऽऽ ! “ औकात इसी को कहते होंगे, शायद ?
यही हाल अपना है.. कोल्ड ड्रिंक देखि के बुखार आता है.. भले लस्सी दे दो.. या शिकंज़ी की बात ही कुछ और है.. सत्तू का शरबत भी मँज़ूर.. बेल का शरबत मिलि जाय, समझो कि वाह वाह की जय जय ! ठँडी बियर शियर तो खैर..
हमारे इतने चीकने पात भी न थे, जो इन होनहारों के हैं ! सो ऎसी कोई पिबंति धातु की वस्तु पी जाती है, या पीने स्कोप हुआ करता है । यह ज्ञान ही न था ! ऎसा उल्लेख किया जाता है, कि मैं बचपन से ही पिछड़े कैटेगरी में आता था ! पहले तो दूध से ही संतुष्ट हो लेता था, फिर यह यात्रा शिकँज़ी , शहतूत और भी भिन्न किसिम के शरबतों के बीच शँटिंग करती रही.. पर, कभी कभार मेहमान वगैरह के आने पर रूह अफ़्ज़ाई का चाँस भी मिल जाया करता था !
बाली उमरिया में ही प्रिमेडिकल वालों ने खदेड़ दिया और हम पहुँच गये कानपुर ! क्या तो सहर रहा.. कलक्टरगँज से बेनाझाबर.. हईयन हईयन हईयन रिक्शा वाला मेरे वेहरे के सामने अपना चूतड़ उचकाय रहा है, अउर अईसा शहर है कि खतम होने को नहीं ? बड़ी ऊब होती रही… मन करता था कहूँ, “ रिक्शा वाले भाय.. तुम ईहाँ बैठो.. अब हमहूँ तनि चालीस पचास पैडल मार लेयी, तुम्हरे रिक्शा मा ! “ बहुत सारी बातें मन में ही घुट कर रह जाती हैं, यह भी उनमें से एक रहा है ! आज खोलि रहे हैं,एक्लूसिवली आन निट्ठल्ला ! मन की घुटन इसी लोक में गूगल बाबा के चरणों में अर्पित कर दे.. ना ना कोई बात नहीं… अपने छद्म नाम से ही संकल्प ले ले, तू बस अभिव्यक्त हो ले और छुट्टी पा ले !
गूगल बाबा के डाक बक्सा में कोल्ड ड्रिंकन की बाढ़ आयी हुई है ! याः देक्खो.. फलाने सेन्ट यू अ.. ढिकाने सेन्ट यू अ कोल्ड ड्रिंक ! यहाँ तक तो ठीक रहा.. लेकिन आजु एक बिल्ली रास्ता काट गयी ! कऊनौ dipika123 जी ने भी कोल्ड ड्रिंक पठाय भेजा ! दिनेश जी.. अनिल पुदस्कर जी वगैरह को तो टरका दिया था, बेचारे मान गये ! यहाँ तक कि एक भड़ासी भाई भी मान गये.. कमरे में बैठ कर कीबोर्ड से आग उगलना और बात होगी.. लेकिन ज़नाब मान तो गये ही , यह क्या मेरा कम मान है ? पर दीपिका… शायद वह भी मान जाती..अगर मैं अपने फुल फार्म में डाँट देता.. वही तो ?
लेकिन हमारै मन बेईमान होय गया,थोड़ा बहुत हिलने डुलने के बाद महामहिम मन महाशय ने अपने पासवान जी यानि हमारे दिमगिया को पुचकारा , “ देख ले भाई.. तनि देखि भर ले.. तेरा क्या जाता है ? लड़की जात है, जो बात बात पर कोल्ड ड्रिंक पिया करती हैं.. फेल तो कोल्ड ड्रिंक.. पास हुई तो कोल्ड ड्रिक ! ग़र रूठ गयीं तब भी इनको मनाने को है ना.. कोल्ड ड्रिंक !! और.. और, यह तो तुम्हरे कम्प्यूटर में समा के खुदै कोल्ड ड्रिंक लिये खड़ी है ! बस झाँक भर ले.. भले ही मत पीना.. कौन दिनेश जी यहाँ देख रहे हैं .. डर मत कौन तुमको अवमानना का नोटिस ही भेजे दे रहे हैं ?
अरे.. देख भी ले भाई ! तो फिर देखा ? ♬ ♩ ♪ ♫ ♬ .... ठहरिये जरा, दो घूँट पानी पी कर फौरन आता हूँ ! गला तो भाई अपने घर के पानी से ही तर होता है । हर पानीदार का यही ठिकाना है.. गलत गलत गलत कट ( Censored ).. आप कुछ और पढ़िये
फिर.. अपुन को ऎंवेंईं .. सिनेमाई चलित्तर में पीने पिलाने वाली लाइन के गुरुदत्त जी याद आ गये..’या दिल की सुनो .. दुनिया वालों.. या मुझको ही चुप रहने दों ऽऽ “ वाले गुरुदत्त ! मैं चुप नहीं हूँ, सब उगले दे रहा हूँ.. ज़ाहिर है कि, ऎसे परफ़्यूम दिल की ही सुनवायेंगे ! तो, सुनिये.. वर्ड काउँट 2509 हो गया है .. अब सुनाऊँगा तो रात बीत जायेगी !
कहना तो बहुत कुछ है, लेकिन इससे आगे जो भी लिखूँगा, वह पढ़ना शायद आपके लिये इतना निरापद न रहेगा । बाकी आप जानो कि एक अबला को इस मेलबाक्स से उस मेलबाक्स तक भटकाना कहाँ का अन्याय है ?
6 June 2009
ने टाइम खोटी किया Saturday, June 06, 2009 | 13 टिप्पणी | कभी कभी मेरे दिल में, कमज़ोर सरकारों कीपरंपरा, बेतक़ल्लुफ़, संदर्भहीन व्याख्यायें
बच्चा बच्चा... बूढ़ा बूढ़ा... हाल तुम्हारा जाने है
कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप निकला था, और मैंने उसे भाग जाने दिया । अभी भी वह यहीं है, किसी ठँडी जगह में.. । रिशि मुझे नसीहत दे रहे थे, कि आपने ’ उसे नहीं मारना ’ कह कर ठीक नहीं किया । मैं उनको धरती पर साँपों के होने का महत्व समझा रहा था, इनका भी जैविक पर्यावरण में एक अहम किरदार है । इतने में रिशि महाशय मौजिया पड़े फिर तो अपने लीडर्स इनसे ज़्यादा खतरनाक हैं, न अँकल ? मैं चौंकता हूँ, इतना सा बच्चा.. बातें कैसी कर रहा है ? मन में एक सँशय उभरता है कि,… ऎन मेरे नाक तले इसका बचपन कौन मार रहा है, जी ?
मेरे पूछने पर, वह हज़ारहाँ कसमें खा बैठते हैं, " यह मैंनें खुद सोचा है .. न मानिये तो, जो आपने वो वाली.. अरे वो नवनीत वाली बड़ी सी स्केचबुक दी थी, देख लीजिये मैंनें इन सबकी फॊटू भी बनायी है । "
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काटो काटो, जब झटका लगेगा.. तब न कहना
देखा आपने.. सहज विश्वास नहीं होता, न ?
मुझे भी यकीन न हुआ था कि, बच्चा बच्चा इनकी पदलोलुपता और निरँकुशता से इस कदर परिचित है ।
अब सो भी जाओ " पीछे से चिर-परिचित स्वर आता है । कँठ से लगा कि, शायद हमारी वो हैं ? इत्ती रतिया में, भला कौन ’ हो गई आधी रात ’ गुनगुनाने आयेगा, रे बुरबक ! वर्षों से बिना शर्त समर्थन देते आ रहे हो, अब इनके ही आगे शायद लगाते हो.. क्या वन्डरफ़ुल मेमोरी है, यार ? ( मेरा मन है कि, कम से कम धिक्कारता तो है ) शायद डेस्कटाप स्क्रीन से छन कर आती रोशनी ने ही इन्हें जगा दिया हो ? " अब सो भी जाओ, तुम भी क्या सब करते रहते हो.." उनींदी लहराती हुई आवाज़ टायलेट की ओर जा रही है । अच्छा अच्छा.. अच्छा अच्छा ! मैं भी रैली में चल रहे उकताये हुये भाड़े के टट्टू की तरह, बिना नारा सुने ज़िन्दाबाद लगा देता हूँ । का करें, इस बाड़े में जो रहना होगा, तो वन्दे बाबू-ईषिता मातरम कहना होगा ।
लौटते कदमों की आवाज़, नज़दीक आते आते मेरे पीछे आकर ठहर गयी । जब तक मैं अपनी बँधी गरदन मोड़ पाऊँ, एक सवाल दग जाता है, " रिशि ने खुद बनायी है... याऽऽ हः ( जम्हाई ) कि तुमने खुद ही तो डायरेक्शन देकर नहीं बनवायी ? " सनातन कालीन सतत शँकालु सहधर्मिणी है, यह !
कुछ कुछ समझ कर मैं,अपने चेहरे से खीझ के भाव को दुःख भाव में ढालने का प्रयास करता हुआ तमतमा गया, " क्या यार, आखिर तुम चैन से क्यों नहीं सोतीं ? मैं कोई मीडिया वाला हूँ कि, व्यूअर काउँट बढ़ाने को इस तरह की चीप स्टिंग मैन्यूपुलेशन करूँ ?
मैं ब्लागर हूँ.. ब्लागर ! सभी दबाव समझौतों से मुक्त ब्लागर
वह मेरे को कुछ ग्रेसमार्क दे देती हैं, " अच्छा अच्छा.. ठीक है.. तो अब सोने चलो.. ब्लागिया कहीं के "
सुना आपने.. .. हाय राम, इतनी इज़्ज़त बख़्शने के बाद भी, आज इन्होंनें मेरे सँग आपको भी इस माफ़िक बोला क्या ? इसका मतलब यह कि, बच्चा बच्चा.. बूढ़ा बूढ़ा... हाल आपका जाने है..
2 June 2009
ने टाइम खोटी किया Tuesday, June 02, 2009 | 19 टिप्पणी | निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, बुरबकई, बेतक़ल्लुफ़
लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।
धन्यवाद भाई जी, तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण वास्ते इक निट्ठल्ली पहेल्ली हो जाण दै । मन्नैं इनाम वीनाम देना कोणी, मर्ज़ी हो बूझ.. ना मर्ज़ी बने तो टिप्पण आले बक्से से परे नट जा । ये रही अपणी पहेल्ली..
एक मारे से मरा
काण खोल के पढ लै, एक मारे से मरा..
दो सँदेशे से मरे
और सँदेशी मरा जब तीन चले परदेश
ते कुल पहेल्ली यो करके बनी के
एक मारे से मरा
दो सँदेशे से मरे
सँदेशी मरा कब ?
जब तीन चले परदेश
मुस्किल आण पडी हो ते यो बता दूँ के…
यो पहेल्ली लाल लँगोटे वाले लँगूर के बास के खानदानी से मतलब राख्यै सै !
लगे हाथ निट्ठल्ले का ग़ज़नी के स्क्रीन टस्ट से रिजिक्ट फोट्टू भी देखता जा, यो पहेल्ली का हिस्सा नाय
..










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