यूँ ही निट्ठल्ला, भला क्यों करता बकवास
गुनिये शायद निहित होगा यहाँ कुछ ख़ास
वरना तो समझिये बस निरर्थक टाइमपास
मानिये सहज गल्प, लँतरानी और परिहास

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23 December 2008

| 11 टिप्पणी |

वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

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स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र
बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं । दीपावली मनाने दो वर्ष बाद छुट्टियों में घर आये हैं । सब ठीक ठाक गुज़र रहा था, मात्र चार दिन ही रह गये थे, कि बेस से वारंट आगया.. ... रिपोर्ट इमिडीयेटली ! बीबी ने उनका सामान बाँधा, उन्होंनें कुलदेवी के सम्मुख सिर पर क़फ़न बाँधा और चल पड़े लाम पर ! रिपोर्टिंग की औपचारिकतायें पूरी हुईं, एक संक्षिप्त मीटिंग... और यह तय पाया गया कि जिसको जिस क्षेत्र की अधिक जानकारी है,उन्हें वहीं भेजा जाय !   
आज लगभग दस दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ |ये अन्डरस्टैंडिंग है...का दूसरा भाग पूरा करना शेष था । ब्लागर की सीमित दुनिया में सुरक्षा संचेतना सुनामी या कहिये कापी-पेस्ट काँव-काँव के थमने की प्रतीक्षा में स्वामी का यह आम आदमी पाँच दिनों के लिये टीकमगढ़ के बंज़र की खाक छान आया ! बस ऎंवेंई ही... वहाँ की दुरावस्था पर बहुत कुछ सुना था, सो देख भी आया ! वहीं पाकिस्तान के विषय में गाम की एक औरत बमुश्किल बता पाती है, " किस्तान -उस्तान तै हम्मैं नाहीं पतौ ! लड़कन बतावत जे अपँयैं भारत माता  ते जरन वारे लोग गुंडन के भेज के बम्बई मां दंगो धमाकौ कराय रहै अउर जे सरकार हाथै पै हाथ धरै आगि तापि रही !" किंचित हिचकिचाहट के बाद साहस बटोर कर एक झटके में पूछ भी लेती है, " तू कोनि सरकारी जसूस तै नाहीं ? " एक पोस्ट का मैटर है, सो छोड़िये यहीं ! कल शाम साबिहा समर की पाकिस्तानी पंज़ाबी फ़िल्म खामोश पानी देखी जिसमें ज़िया-उल हक़ के ज़माने की किरन खेर अपने लड़के सलीम मलिक को रफ़्ता रफ़्ता इस्लामी कट्टरवाद में डूबते जाते देखती है, असहाय बेबस ! निःसंदेह एक सशक्त फ़िल्म है, यह ! आज की विहंगम चिट्ठाचर्चा पर श्री सत्यनारायण ' कमल ' से परिचय हुआ.. उनकी वयोवृद्ध लेखनी से निकली जोशीली पोस्ट ने जैसे मुझे जगा दिया .. काल करै सो आज कर...  लिख ले जो लिखना है, तुझे ! आपको मेरा सादर धन्यवाद शर्मा जी, Island with a palm tree यह रहा…      वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है ! 

  अन्डर्स्टैंडिंग और.....सियासत

अब शुरु हुआ कठोर श्रम और चुहलबाजी का दौर.. ख़तरों के इतने नज़दीक रह कर.. बारूद की गंध में भी यह ज़वान हँसने के मौके तलाश लेते हैं ! जीवट के जीवंत मिसाल हैं हमारे ज़वान ! यम भी इनसे पनाह माँगें, ऎसे हैं

पर, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी.. चौकी पर लगे लाउडस्पीकर अपना अलग मक़सद रखते हैं ! पर, इसी के ज़रिये सीमा पार के सैनिकों से नोंक-झोंक भी कर ली जाती थी.. जस्ट फ़ार चेन्ज़ ! टैंक अदल बदल के किस्से तो अब चुटकुलों में भी शामिल हो गये हैं ! एक दूसरे की आवाज़ों के इतने अभ्यस्त..कि नाम भी पहचान लिये जाते हैं..  मसलन पिछली बार मोहायम.. परवेज़ वगैरह की ज़िन्दादिल पर रस्मी ललकार कभी कभी इनको भी मोह लेती थी ! एक बार मैंने पूछा भी था कि, " यह सब कैसे बर्दाश्त करते हैं ?" उन्होंने तन कर कहा फ़ौज़ी की कोई धर्म- जाति नहीं होती.. बस हमारे को एक चीज मालूम होता है, कि हमारा मुल्क सबसे ऊपर .. पीछू को चाहे मज़हब बोलो तो.. चाहे पालिटिक्स बोलो और चाहे.. और चाहे तो क्या और क्या .. करते हुये वह अपनी किसी लक्ष्मणरेखा पर ही  अटक  जाया करते ! मोर्चेपरमैं कायल था उनकी सतर्कता का..चींईं ईंईं ब्रेक लगा लेने का गुण !

हाँ तो, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी । उस पार के लाउडस्पीकरों से पाक़ीज़ा, उमरावज़ान सरीखी उर्दू फ़िल्मों के गाने बजते, जो रेगिस्तान में दूर तक गूँजते हुये अज़ब का दिशाभ्रम पैदा करते । स्साले.. हमारा गाना सुने बिना ख़ाना हज़म नहीं होता.. अबे दुपट्टा ओढ़ता ही काहे है.. जो इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना का रट लगाये है.. फिर हा हा हा उहू उहूः हू से बैरक गूँज जाता ! देखीए यूयन्नो में भि इ सार मुसरफ़वा ईहै दोपाट्टा गा गाके बुसवा को खसम बनाय लिहिस है .. सुमेर बलियाटिक ठुसकी मारते.. वह हमेशा यू.एन.ओ. को यूयन्नो ही कहते,   और फिर वही अहाहाहा हा ह्हा ह्हायगे माई.. भाई लोग अगले पल से बेख़बर हँसते हँसते खुद ही दोहरे हो जाते, वाह जीना इसीका नाम है!

पर नहीं, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी ! एक ख़ामोशी छायी हुई थी.. उस पार से " यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान.. कैयदेअज़म तेरा एहसान तेरा एहसान " जैसा कुछ लगातार सुनाई पड़ रहा था ! लांसनायक अपने ज़वानों से आँखें चुराने लगते.. काहेकि उनके ज़वान ऎसे लम्हों में अपनी प्रश्नवाचक निगाह उनके ऊपर लगातार साधे रहते,“बोलो,हमें क्या बोलते हो नायक ? ” 

क्या करते लांसनायक भारती ? अभी तक ऊपर से एक्शन का कोई आर्डर नहीं आया है.. एक भद्दी गाली मन में दे लेते.. हमारे ज़वानों का मोरल डाउन हो रहा है.. एक बार आर्डर मिल जाये तो इनका रोज का किस्सै ख़ैत्तम कै दें। चबा कर बोलने के चलते उनका ख़तम हमेशा से ख़ैत्तम ही रहा है ! गौरमिन्ट सट्ट साधे है... कुछेक क्षण अपने को संयत कर दायें हाथ से छुक छुक गाड़ी जैसा एक्सन करते हुये बोलते, " पब्लिकिया  भी ये नहीं करती और दुनिया का नाटकबाजी.. हाँय नहीं तो ? " उनकी हताश मुद्रा पर उनके ज़वान भी द्रवित हो उठते, पर.. क्या ?

ख़ैर, अब जल्दी से आगे बढ़ते हैं.. क्योंकि मेरा कुप्रसिद्ध तीन बजने को ही है ! इस रोज रोज की चिक चिक से ऊब कर आपस में यह तय पाया गया कि इस बार गश्त पर हम भी आमने सामने थोड़ा बहुत ज़ुबानी ज़माख़र्च हो लेंगे ! ताकि यह कुछ दिन तो शांत रहें !  अगली गश्त पर देखा तो सामने बाड़ के उस पार परवेज़ मियाँ गश्त पर हैं.. ' चलो, इनसे थोड़ा शिकवा शिकायत हो जाये । मियाँ नम्बरी चीज हैं.. टैंक अदल बदल करने का आइडिया इनका ही था..स्साला फ़रेबी ! बातचीत में इतने सधे और मीठे कि लगेगा अपनी बिटिया का रिश्ता देने आये हैं ! चलो अपना क्या है.. हाल चाल ले लें इनका भी मन बहल जायेगा और इस बदले मिज़ाज़ का रंग भी मिल जायेगा ।' यही सब मन में सोचते आगे बढ़े.. ऒईलो, ये तो स्साला गाली दिये जा रहा है ! एकदम से खौल गये, " ज़नानियों की तरह गाली क्यों देता है, बे ? " ससुरा वह आधी घुटी हुई दाढ़ी और जोर-शोर से गरियाने लग पड़ा.. क्या कहा वह आप न ही पढ़ें तो अच्छा है । भारती दहाड़े, "अबे गाली क्यों देता है.. सिर्फ़ दो हाथ लड़ ले तो जानें !" परवेज़वा जैसे गाँज़ा लगाये था, "किसने क्या कहा बे , सबूत है तेरे पास ?" भारती ऎसी स्थिति के लिये कतई तैयार न थे.. "ऒईलो, खुल्लम-खुल्ला गरिया भी रहा है और उल्टे मुझीसे सबूत भी माँग रहा है, धूर्त ?"

क्या करते लांसनायक भारती ? उन्होंने हनहना कर एक लात उसके पिछवाड़े जड़ दिया । बस, इतना ही था कि, सहसा तड़ तड़.. तड़ तड़ गोलियों की बौछार शुरु कर दिया मरदूद ने ! छिटक कर एक गोली हमारे लांसनायक के बाँयें टखने पर लगी, उन्होंने झटपट आड़ में पोज़िशन ले ली । तनिक झाँक कर चिल्लाये, "दिमाग ख़राब हो गया है... कल तक तो हमारे दम पर ऎश कर रहा था, 15-15 दिनों की दो छुट्टी दिलायी .. सो भूल गया ? " वह मेरी तरफ़ से अन्डरस्टैंडिंग थी.. यह था परवेज़ का ढीठ ज़वाब ! " तो फिर गाली क्यों देता है और कहता है कि सबूत दो, मक्कार ? "  परवेज़ की मशीनगन थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! फिर चिल्लाये हमारे नायक, "अबे, वार डिक्लेयर तो होने दे..!!" परवेज़ सचमुच मक्कारी से हँसने लग पड़ा, " किसी गाली वाली का कोई सबूत तो दिया नहीं.. उल्टे हमारे पिछवाड़े लात ठोंक दिया... हमलावर तो तू है, पाज़ी ! वार तो तूने ही डिक्लेयर कर दिया है !"

“ऒईलो, यह क्या कह रहा है, तू ? “ भोले भारती चकराये ! ” मैं कुछ नहीं कह सुन रहा... यह तो दुनिया ने देखा कि पहला वार तूने ही किया है ! जाकर किसी से पूछ..  यह सियासत है !” परवेज़ अबतक हँस रहा है 

अकारण स्पष्टीकरण: जूताखोर भुश्श पर नपुसंक क्रोध के प्रतीक ज़ैदी के जूते पर हमारा ब्लागजगत आह्लादित है, चुहल में व्यस्त है । जहाँ संवेदनाओं के विलाप का बाज़ार नित्य नये तराने ला रहा हो, ऎसे में फिर वही मुंबई धमाके को संदर्भित पोस्ट ? आपके ऎतराज़ की कद्र करते हुये भी न्यू मैरीन लाइन्स के बिटिया के हास्टल की छत से मोबाइल पर आती धमाकों की अस्फुट आवाज़ें, लड़कियों का डर और घबड़ाहट के मारे गश खाकर गिरना, उन सबको एक कमरे में बंद करके रखे जाना फिलहाल मैं भूल नहीं पाया , क्योंकि यह सब एक अलग किसिम की सिहरन देती आ रही है ! क्या करें ?
एक बात और :पोस्ट का ऎसा अंत सामयिक संदर्भों के चलते अपरिहार्य सा प्रतीत होता लगता है.. साथ ही अनिवार्य सा भी लग रहा है ! फिर भी, मुझे इस पोस्ट का ऎसा अंत प्रस्तुत करने का सदैव पश्चाताप रहेगा । पर, यह पश्चाताप अब तक के लाखों उ्जड़े परिवारों के हाहाकार एवं वतन की आज़ादी के राह पर कुर्बान हुये हुतात्माओं के ठगे जाने के शोक से लाख दर्ज़े हल्का बैठ रहा है ! खैर, कूटनीति, सियासत व मज़हब की आड़ में पल रही सत्ता-लिप्सा का कहीं तो अंत होगा ? प्रतीक्षा है, ऎसे स्वर्णिम आशा के फलीभूत होने की... बस, आप भी इस प्रतीक्षारत कतार में लग जायें, और क्या ?
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13 December 2008

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ये अन्डरस्टैंडिंग है और वो सियासत थी

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स्थान : सीमा चौकसी चौकी, देश में कहीं भी..
खट्ट्क्क खट्ट्क्क खट्ट्क्क .. हवलदार रामबवाली भारती मेज़र फ़ेरन सिंह के सामने जा खड़े हुये, पंज़ों पर उचक कर एक सैल्यूट मारा, " शौह्हः , मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !"
मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी  थी ।
अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया ।  सर, पूरा का पूरा  क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"
   nitthalla  binavajah
अब मेज़र फ़ेरन सिंह हैरान.. यह कैसे ? बाहर निकल कर देखा तो सचमुच एक पाकिस्तानी टैंक खड़ा है ! ख़ुशगवार माहौल में अपने कुछ ज़वान उस पर टँगे हुये मग्गों में चाय पी रहे हैं और दो जन एक रज़िस्टर में कुछ औपचारिकतायें दर्ज़ कर रहे हैं । मानना ही पड़ा मेज़र को, उन्होंने आगे बढ़ कर रामबवाल को अपनी बाँहों में दबोच लिया, " वेलडन ज़वान, तुमने अपना वादा पूरा किया, तुम्हारी छुट्टी मंज़ूर हुई समझो.. मैं वायरलेस पर बेस को पूरी इन्फ़ार्मेशन दे देता हूँ, जाओ.. आराम करो !"
शाम को अनौपचारिक गपशप में मेज़र ने हुलस कर कहा, " बधाई हो, ज़वान छुट्टी मंज़ूर हो गयी । पर, यह सब तुमने अकेले कैसे कर लिया ?" रामबवाली ने सिर झुका लिया, "मैं आपका मातहत हूँ, सर.. झूठ नहीं बोल पाऊँगा ! सिपाही का दर्द सिपाही ही जानता है, अन्डरस्टैंडिंग है, सर ! उधर का सिपाही भी जब छुट्टी चाहता है, हमसे टैंक माँग कर ले जाता है ! यही अदला-बदली इसबार भी किया है, सर !"
"यह चीटिंग और जुगाड़ है, यू फ़्राड ?" मेज़र गुस्से जितना गुस्से से काँप रहे थे,                                          उतनी ही शांति से हवलदार ने कहा.. क्या कहा ? वह बाद में .. .. ..
F
चाहे तो इसे आप ..सनक के समावेश पर शिवभाई की व्याख्या की पुष्टि ही समझें, या कुछ और.. 
1995 से 2000 के दौरान अपने वार्षिक अवकाश का गंतव्य मैं सीमा को छूते हुये देश के हर उस भाग को बनाता रहा, जो सड़क मार्ग और कुछेक ट्रैकिंग से नापा जा सकता था । इसी कड़ी में 1996 के शीतावकाश में मेरा जैसलमेर के निकट  लगभग 27 किलोमीटर पर स्थित, सीमावर्ती गाँव सम तक जाना हुआ ! एक यादगार यात्रा, क्योंकि कई औपचारिकताओं से मुक्ति मिल गयी थी !



एक दूरी के बाद फोटो लेना मना है, इसलिये अंतिमबिन्दुके चित्र ही आप देख पा रहे हैं ! सच में बड़ा रोमांचक रहता है, नो मेन्स लैंड पर खड़े होकर विश्व का सर्वथा स्वतंत्र स्वछंद नागरिक होने का अनुभव करना ! कुछेक सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हुये..( जिसका मुझे खेद है ) और अपने एक नितांत अंधभक्त की सहायता से हम सीमावर्ती बाड़ तक जा सके ! दस कदम आगे और बढ़िये, और.. आपकी नागरिकता बदल गयी ! उधर से भाग कर आती हुयी पाकिस्तानी भेड़, दो छलांग में हिन्दुस्तानी कहलायेगी ! है न, अज़ीब बात ? खैर छोड़िये.. वहाँ रेत पर एक माचिस की खाली डिब्बी पड़ी देखी.. पिंज़रे में बंद बंदर छाप, उसपर कुल क़ैफ़ियत उर्दू में ही थी ! अंकों को छोड़ कर कुछ भी अंगेज़ी में नहीं था ।  मैंने यादव जी ( काल्पनिक नाम ) से पूछा, " पाकिस्तानी माचिस हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कैसे ? " उसने बेपरवाही से उत्तर दिया, "हमारे किसी ज़वान ने सिगरेट वगैरह सुलगाने के वास्ते लिया होगा ।" मेरा 12 वर्षीय बेटा अपने जिज्ञासाओं का अनंत कोष यादव के सम्मुख खोल बैठा ! कुल ज़मा निष्कर्ष यह था, कि अपनी अपनी सीमाओं में हम अपनी ड्यूटी कर रहे हैं.. उसमें कोई ढील नहीं.. पर किसी चरवाहे या ज़वान से कुछ माँग लेना या कुछ दे देना एक सामान्य बात थी वहाँ ! लाउडस्पीकर से एक दूसरे के हाल चाल तक पूछ लिये जाते थे ! मुझे अटपटा लगा और मैं सत्ताधारियों के झगड़ों और इन सुरक्षा प्रहरियों में इन झगड़ों के प्रति कोफ़्त को नज़दीक से देख पाया ! कोलकाता से निकलने वाले देश ( দেশ ) के  पूज़ा विशेषांक 2002 में यह प्रकाशित भी हुआ है ! पोस्ट उसी को आधार बना कर थोड़े अलग ढंग से लिखी गयी है, क्योंकि.. हवलदार भारती ने क्या कहा, इसका समावेश तो अभी बाकी है !
हवलदार ने फ़ीकी हँसी के साथ कहा, " अब आप जो भी कह लो साहब पर, जुगाड़ से ही तो दोनों मुल्कें बनी हैं, जुगाड़ से ही उनकी सरकारें चल रही हैं, और उनके इस जुगाड़ को ज़िन्दा रखने और चलाते रहने के लिये हमलोग नाहक आमने सामने खड़े ड्यूटी के नाम पर अपनी ज़िन्दगी खराब कर रहे हैं.." 
यह तो उसने मुझसे कहा था, जिसको मैंने इस पोस्ट में मेज़र के मत्थे मढ़ दिया है, पर आलेख पूर्णरूप से आपबीती पर आधारित है
इससे आगे

9 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

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यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !
हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?
तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !
लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !
इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !
पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?
ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..
_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________
यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !
विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...
ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !
नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :
है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 
शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !
मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !
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7 December 2008

सनद रहे कि यह नकल है..

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अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को... नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये                                                            और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें
art-thief_e0मैं नक्काल - अमर
ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।
ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।
ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।
पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ*
दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।
तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।
पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।
दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।
( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)
पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।
तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।
दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?
पहला - रीतेश देशमुख....।
दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।
तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।
अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -
ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।
सत श्री अकाल जी।
सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)
पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।
कित्थे जा रिहा है।
ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।
पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।
( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)
उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।
सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।
यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।
_____________________________________________________________पहचान तो नहीं लिया ? मैं क्यॊ बताऊँ कि यह सतीश पंचम की पोस्ट है, या मेरी ? अब कुछेक पल को कल्पना करें, कि यह पोस्ट मई 2007 में लिखी गयी होती तो ? क्या पता, लेखक अपना पोस्ट मैटर कहाँ से खोद कर लाया है ? आप तो पब्लिक की शार्ट-मेमोरी के मुरीद हैं, न ? शर्मा-शर्मी में भी, कोई शर्मदार एक टिप्पणी तो डाल ही जायेगा, नीचे वाले चौकोर कमेन्ट-कटोरे में ! चलिये मान लेते हैं कि यह सतीश पंचम जी की ही पोस्ट है, तो मैं उनकी लोकप्रियता में श्री-वृद्धि ही तो कर रहा हूँ ?  यह बौद्धिक संपदा पर अतिक्रमण कैसे माना जाये, आप ही बोलिये ?
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1 December 2008

ब्लागिंग विदाउट परपज़ !

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नेट पर बस इधर उधर टहल रहा हूँ । लोगों ने आनन फ़ानन मुंबई हादसे पर अपनी हाज़िरी लगा दी है । कुछेक जन तो बहुत ही गंभीर रहे हैं, कुछेक डाक्टर सेक्योरिटी को मारने पीटने के तेवर में दिखे । डाक्टर तो आपने ही चुना होगा । पर, मैं क्या लिखूँ, यह सोचता हुआ अपने इमेज़ एडीटर से खिलवाड़ कर रहा था, मन में चल विचारों को संयत भाषा में बाँधने की उठापटक चल रही है, सहसा कहीं छिपे किसी अदृश्य विचार ने यह इमेज़ बनवा दिया

    क्या आप...अमर       

कोई एकमत न हो पाने पर दूसरी एक और मीटिंग रखने का मौका हाथ में रहेगा
दो मिनट के मौन में, आप शाम को घर ले जाने वाली शाक-भाजी का निर्णय तो ले ही सकते हैं ?

तो.. आइये आज हम देश की सुरक्षा व्यवस्था पर अपनी मीटिंग जारी रखें

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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