यूँ ही निट्ठल्ला, भला क्यों करता बकवास
गुनिये शायद निहित होगा यहाँ कुछ ख़ास
वरना तो समझिये बस निरर्थक टाइमपास
मानिये सहज गल्प, लँतरानी और परिहास

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11 February 2009

डा. अनुराग के बचपन पर कराह उठा यह पचपन

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जैसे जैसे डा. अनुराग की पिछली ज़बरदस्त पोस्ट को बाँचता जाता, दिल से.. हमारे वाले दिल से, कराह उठ रही थी, “हाय अमर तुम न हुये ।” ऎ भाई कोई यहीं खुन्नुस न निकाल लेना, कि “ अगर होते तो, क्या उखाड़ लेते ?” एकदम सच बात है, मैं क्या कर लेता.. ?

मैं बचपन में ही चुगद था, और विद्वान टिप्पणीकारों के मत में, सो तो अब तक हूँ । अब यह शब्द इतना सहज लगता है.. कि फ़ौरन ही हर ऎसे टिप्पणीकार की पारखी निगाहों का फ़ालोअर बन जाता हूँ । मेरे बाबा कोई चीज बरबाद होते हुये देख कहते.." सकल वस्तु संग्रह करहूँ आवैहिं एकु दिन काम, समय पड़े पर ना मिले माटिहूँ खरचे दाम । " सो अपना अमूल्य ( दो कौड़ी से कुछ कम.. का एक नाप ! ) मानव मष्तिष्क मौका-ए-नज़ाकत वा वक़्त-ए-ज़रूरत पर काम आने के लिये सहेज कर रखना अपना परम कर्तव्य समझता । ज़्यादा दिमाग लगाने से परहेज़ करता, " अरे होगा न... मुझे क्या ? " जैसा भाव मुझे दुलराता रहता । बस मियाँ ठूंस के खाओ और मस्त रहो । आपके सामने है.. खेलेंगे कूदेंगे वाले नवाब बने ऎंठ रहे हैं.. और पढ़े लिखे वाले.. रहे चप्पल चटकाय

अब तो खैर, ठूँसना ठूँसाना ग़ुज़रे ज़माने की बातें हैं । बबच्चे तो क्या बाप लोग  यह सब एन्ज़्वाय कर रहे हैं.. और बच्चे खाना पीना सोना भूल कर मम्मी-डैडी के ज़मूरे बने हुये हैं । इतने परसेन्ट लायेगा.. हाँ, लायेगा !    ज़िंगल बेल ज़िंगल बेल छुनायेगा..     ऎंऎं ऎं ! हाँ लाजा बेटा छुनायेगा । ऎंऎं ऎं । छुना दो जल्दी से.. ऎंऎं ऎं जींगिल्ल बेल्ल ..जींगिल्ल बेल्ल

छोड़िये, लगता है.. मैं बहक रहा हूँ । आते हैं अनुराग प्रमेय पर.. जो आज तलक हल न हुआ । नर और नारी अलग अलग जीव होते हैं ,यह एहसास हुआ तो कुछेक दिन-महीने तो विस्मय में ही कट गये । समाधान करने वाला कोई विश्वस्त सुपात्र इर्द गिर्द मिलने में नहीं आ रहा था । फिर भी मादा का महत्व कुछ कुछ समझ में आने लगा था, पर विषद रूप से जानबे की इच्छा इधर उधर निगाहें दौड़ाने पर मज़बूर करने लगी । जैसे आप भी करते रहे होंगे, छुप छुप के....छुप छुप के...चोरी हो चोरी ...और कैसे ?

अल्ला अल्लाह खै़रसल्ला्ह , इसी दौर में एक नयी नवेली चाची का परिवार में आगमन  हुआ । न जाने क्यों,  उनकी मुझ सरीखे हाफ़-पैंटिया निरीह पर विशेष और एक बेबाक किसिम की कृपा बनी रहती,  न जाने क्यों ? चाची एक अदद रेडियो भी साथ लेकर आयी थीं ,9 के अंक में फंसे लाल बैटरी वाले सहबोला समेत, बात दीगर है कि कहलाता वह हमारा रेडियो था । इन सद्यब्याहता चाची का रेडियो प्रेम हम सब के लिये कौतुक का विषय था । हां तो, बज़रिये रेडियो बहुत सारे गाने सीधे सीलोन से उड़ते हुये सीधे उनके कंठ में अवतरित हुआ करते थे । अच्छे गीत और स्वर की तमीज़ मुझे तो थी नहीं ! लेकिन, अपने बदन से एक अलग ख़ुशबू छोड़ते हुये उनका मौके बेमौके गुनगुनाते हुये इधर उधर डोलते रहना बहुत भाता था । और, जब वह नाक व भ्रुकुटी सिकोड़ कर मेरे गाल गुनगुनाते हुये खींच देती थीं तो मानों मेरा मनमयूर गुलाटी खाने लगता था । हाय्य दईय्या,  हमका ई सब याद न दिआओ !

सो इन्हीं दिनों वाया दीज़ ट्रिकी साँग्स मेरा परिचय इन ’ बलम, सजन, पिया, सैंया , गुईंया, राज्जा, रजउ ’ की बिरादरी से होता भया । मन में घुमड़ा करता, " यह बलम, सजन, सैंया वगैरह वगैरह किस ग्रह के प्राणी हैं ? " मैं लगभग हर आते जाते धूल के फूल को निहारता .. शायद इस छैला टाइप टेरीलीन बुश्सट में छिपे घूम रहे हों ? बलम जैसे अमूर्त ब्रह्म ऎवेंईं थोड़े टहला करते हैं ?

जैसा कि ऊपर आप पढ़ कर जान चुके हैं, वह मेरे चुगदावतार का प्रारंभिक युग था, लिहाज़ा बस इतना ही निष्कर्ष निकाल पाता कि यह अमूर्त जनजातियां इन गीतों के अनिवार्य अंग हैं, पर क्यों ? यह भला कौन बताता ? किंतु इनका एक दूसरा पक्ष  मुँह फाड़ कर और अधिक भरमाता था, कि आख़िर यह बलम रूपी जीव, परदेशी, बैरी,  बेदर्दी  और  यदा कदा  बांके ही क्यों हुआ करते हैं ? जाने क्यों

इस गूढ़ रहस्य को उधेड़ने के प्रयास में मेरा भी जियरा धक-धक करने लग पड़ता । और तो और, इस पिया रूपी किरदार को जिया न लगने का उलाहना देकर भी चोरी-चोरी ही आने की दावत क्यों दे जाती है ? क्या सामने के दालान को पार करके नहीं आ सकता,  पिछवाड़े बुड्ढा खांसता.. तो फ़्रँट डोर से क्यों नहीं आते ?  इमर्ज़ेन्सी में जिया लगाने का बुलावा भेजा गया है, तो चोरी चोरी काहे ?

और तुर्रा यह कि यह पियाजी इतने करूण पुकार के एवज़ में आते ही बांहें क्यों मरोड़ दिया करते हैं, क्या हमेशा से फ़्रीस्टाईल के चैम्पियन रहे  हैं ?  यह बहुत सारे सवाल पहेली बन, मेरे मन को अशांत किये रहा करती थी । अब देखिये न, भूगोल की किताब में सामने साइबेरिया के मैदान का पन्ना खुला पड़ा है और मेरे बाली उमरिया वाले मन में सैंया डोल रहे हैं ! कोई आश्चर्य नहीं कि बहुधा सैंया जी साइबेरिया के मैदान ही में सैर करने लग पड़ते हों , वहां के झीलों को देख मचल उठते हों.. सैंया जी, रेडी ?  हाँ तो, एक्शन.. साउंड मेरे सैंयाजी उतरेंगे पार हो , नदिया... धीरे बहो ’ । अहाहा अद्भुत घोर अद्भुत सईंया धीरे बहो.. न न, नदिया धीरे बहो

वह दिन और आज़ का दिन, यह रूमानी प्रजातियां, विक्रम के बेताल की तरह कुछ पल साथ चल कर उथल पुथल पैदा करते हुए अपनी पहेली मेरे पास छोड़ कहीं अदृश्य में टंग जाया करते हैं । लीजिये अब टंगे रहिये आप भी, या मुझ ग़रीब को ही नीचे उतारिये ।

अपनी बिरादरी में कोई गुदड़ी का तो अवश्य ही होगा, जो इन सैंया लोगन के तिलिस्म में पैठ रखता हो या नक्शा-ए-तिलिस्मात बलमा हथियाये बैठा हो । उनसे लयबद्ध निवेदन है कि जरा सामने तो आइये छलिये....मेरी आत्मा की ये आवाज़ है । क्योंकि तेरा छिप न सकेगा ओ साज़ना.. ‘ मेरे दिमगिया में  जो खाज़ है । ‘  सो डीयर फ़्रेन्ड्स..  दिस मैटर नीड्स टू बी टेकेन सीरियसली एण्ड अर्ज़ेन्टली ! नो जोकिंग.. भेलेन्टाइन दुई दिनन बाद सिर पर सवार है.. और मेरा क्या है.. कल हो ना हो ? आपही मौज़ियाओगे !

amar-11.2.09

अब एक अज़दकीय तड़का : बहरहाल समय के चक्र के साथ मैं भी रस्मी रोमांस के लूपलाईन से दुनियादारी ट्रंकलाईन के शादी जंक्शन पर गृहस्थी फास्ट पैसेंजर से जुड़ उसको खींचखांच यहां तक भले ले आया होऊं और अब अधेड़बुज़ुर्ग टर्मि्नल यार्ड में भेजे जाने को तैयार खड़ा हूं । किंतु अभी तो मैं जवान हूं का नारा लगाता मेरे दिल का यह इंजन बेचारा  इन अधुनातन शब्दों के तिलिस्म में अक्सर डिरेल हो पटरी के बगल अधलेटा, इस पूरे जिस्म में झुरझुरी पैदा किया करता है ।  जादूगर सैंया और सजन सहित मुये बलम परदेशिया को आज तक न जान पाने का दंश कब मुझे छोड़ेगा ? जरा मदद करो भाई मेरे

इससे आगे
यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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