28 April 2009
ने टाइम खोटी किया Tuesday, April 28, 2009 | 13 टिप्पणी | कार्टून एडिटिंग, चिट्ठाचर्चा संदर्भ, निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, बुरबकई
टिपेर तंत्र के अघोरी
22 April 2009
ने टाइम खोटी किया Wednesday, April 22, 2009 | 12 टिप्पणी | कार्टून एडिटिंग, कुछ ख़ास मौकों पर, निट्ठल्ले का फोटोब्लाग
अमारा मौसी का बेटी
स्पीच का बात को पिरेस वाला इतना मच मच मचायेला कि मामला सीरियस हो रैली है, मैडम का वास्ते ! झप्पी बोले तो.. झप्पी ! अक्खा इंडिया में देखो.. पिरेस में गँदा लोग भरेला है, बाप ! तू जा के मैडम को सारी बोल दे , सरकिट !
सरकिट गोल ? अमर सिंग अपुन को इच सरकिट बना डाला.. अपना पालिटिक्स में !
माफ़ी माँग ले, सँजू बाबा !
18 April 2009
ने टाइम खोटी किया Saturday, April 18, 2009 | 19 टिप्पणी | उनकी टिप्पणियों पर, कभी कभी मेरे दिल में..., चिट्ठाचर्चा संदर्भ, पीठिया न खुजाओ.. हो सजना, यह कोई तक़ल्लुफ़ नहीं
हे पार्थ ! दो कप चाय पर.. लिखता रह तू ब्लाग
पिछले शनिवार को कुछ.. और इस शनिवार को इनपर इतने लहालोट हुये जा रहे हो.. तुम भी उमा भारती हो क्या .. ? या फिर इनसे कोई सौदा सेट हो गया है ? भईया, ई पंडितइनिया हमका जिये न देई.. लेयो टोंकि दिहिन ! भगवान इनका मुँह चीरते समय कुछ ज़्यादा ही उदार हो गया होगा ?वईसे दखीए त बतिया सधरणै है, लेकीन पंडिताइन दुल्हिन के ई बात हमयै हिरदै पर सोझे धक्क से लग गेया , एतना बड़ा ज़ुलुम सोच … ?
हमको भी यह 16 मई के बाद वालों की बिरादरी का समझती हैं काऽ.. हौ ? आजकल ई राजनीतिए पढ़ती हैं.. अटकलें बेलती हैं, सकल जग राजनीति फटि पड़ रही है, यहू का करें.. विकल्प होय तो बताओ ? लेकिन कुल जमा थरिया की बैंगन.. सुबेरे राहुल की हैं, संझा अडवानी की होय गयीं, कउनौ भरोसा नहीं इनका… दैट डिपेन्ड्स अपान द क्राउड .. एन्ड आल्सो अपान हाऊ मच मीडिया हैज़ बीन लाउड ! जौन इनका घसीट लेय जाय !
लानत है मुझ पर.. इनको इतना भी पहचान नहीं है कि, हम पैसा खाकर मान्यवर कहलाने की योग्यता नहीं रखते ! रख भी नहीं सकते.. इतना पईसा देखि लेई तौ हार्ट अटैक हो जाये.. नोटों की खुशबू हमारे लिये है क्लोरोफ़ार्म !
मुझे अक्सर आत्मबोध सा होता है, कि हर फटे में टाँग घुसेड़ने की बुरी आदत , मुझे इनके सँगत की वज़ह से ही लगा होगा ! यही सीख देने को फ़ुरसतिया सुकुल बहुत बाद में आये.. हालाँकि तब तक वह भी छहरी युग से बरहा सभ्यता में प्रवेश कर चुके थे ! उनके कीबोर्ड प्रिंट अब रेमिंग्टन का हवाला देते हैं, अमाँ छोड़िये भी, निट्ठल्ले की बातें..
ब्लागिंग करने आये हैं, कि भाषण देने ? जो कहना है, जल्दी कहिये.. अभी बहुत जनों को दुआ सलाम बाँटनी है ..
तो, भाई साहब ( बेहेन जे लोग भी इ्सीको संबोधन समझें.. ) … तो, भाई साहब लोग, आज की चिट्ठाचर्चा पर मन मस्त हुआ जाता था, मन हुआ कि हम भी आज उनको दू ठो लाइन मार दें… सो, गृहमंत्रालय के खाद्य-प्रकोष्ठ में उदर आपूर्ति के संभावित समय का आकलन करने के तात्पर्य से अपनी मँशा प्रकट की ही थी, कि मेरे न चाहते हुये भी आज का यह पंडिताइन टोकाटाकी काँड घट गया..
मैं तो दो लैन लिखना चाह रिया था कि, अनूप जी आज के चर्चारथ से किशल लाल जी तरह जैसे अपरोक्ष ही गीता का उपदेश बाँट गये या फिर मेरी ही समझ का फेर हो.. । वैसे एक और किशन लाल जी कभी हमारे यहाँ से वार्ड-मेम्बरी के उम्मीदवार रहे थे, जो अपने कार्यकर्ताओं को आग में कुदा देने में माहिर माने जाते थे.. रहस्य.. गीता का ज्ञान ? बट.. बाई द वे, यह गीता जी उनकी निजी पत्नी हैं, जो कि शायद विदुषी भी थीं !
( सुना है कि अब किशनलाल जी पर्याप्त सठिया चुके हैं, और ब्लागिंग के लिये उपर्युक्त सिद्ध हो सकते हैं ! )
पिछली बार यह न कह सका कि, राम की सेना वानरों के बिना अधूरी रही है, किन्तु उन्होंनें श्री लँकापति जी की राष्ट्रीय धरोहर अशोक वाटिका को उजड़ने तो न दिया । सो, आज चर्चा पर अपना लिखा कम, मेरा उनका या अन्य किसी का.. पढ़े जाना ज़्यादा स्पष्ट दिख रहा है.. स्माईलियाँ ! ठीक से व्यक्त तो नहीं सकता, पर आज भला लग रहा है.. लोग एक दूसरे के दिये लिंक से कृत्यकृत हो रैले थे !
अनूप जी के अम्मा ( मेरी जानकारी के अनुसार ) के हाथों बनी दो कप चाय में यह तासीर है, कि इतनी उम्दा और सधी हुई चर्चा.. भई वाह, भई वाह ! यह भी एक तथ्य है, कि वह आल्हा गा गा कर भी अपना ब्लागिंग-स्पिरिट जगाये रखते हैं… कहना न होगा, अनूप जी अपने मूड और फार्म पर हों, तो कितनों पर भारी पड़ते हैं, यह आप आज की चिट्ठाचर्चा पर जाकर देख लीजिये ! ऎसे में अपुन का निठल्ला गीता सार तो यही है, कि..
ब्लागर गीता सार
हे ब्लागर क्यों चिन्ताग्रस्त व पथच्युत है
टिप्पणी नहीं आयी भला नहीं बुरा हुआ
व्लागवाणी पसंद न मिला ये भी बुरा हुआ
चिट्ठाचर्चा में नहीं दिख रहे, बुरा हो रहा है
तुम नाहक टिप्पणी न आने का पश्चाताप मत करो
तुम घटते ट्रैफ़िक की चिन्ता भी मत करो
पजामाकतराई व ज़ूतमपैजारीयत्व यहाँ मूल तत्व हैं
तुम निष्काम अपने पोस्ट में मगन रहो
तुम्हारी जेब से क्या गया जो रोते हो
जो टीपा था वह सब यहीं से तो टीपा था
क्या लेकर आये थे, क्या लेकर जाओगे
बरहा, लाइवराइटर सब तुम्हें यहीं तो मिला है
तुम जब नहीं थे तब भी ब्लागिंग चल रही थी
जब तुम नहीं रहोगे तब भी चलेगी
तुम कुछ भी तो साथ न लाये थे
अनूप समीर रतलामी अनुराग कुश यहीं रहेंगे
हौसला लेकर आये थे कड़ुआहट लेकर जाओगे
यहाँ टँकीरोहण वनगमन तो मात्र बहाना है
जबकि लौट कर तुम्हें फिर फिर यहीं आना है
हे ब्लागर, ब्लागर का यही सतत नियम है
जो कम्प्यूटर आज तुम्हारा है,
कल तुम्म्हारे आफ़िस स्टोर का था
फिर वह तेरे बेटे का होगा, और परसों कबाड़ी ले जायेगा
तुम इसे अपना प्राण मान कर क्यों मगन हो
यही खुशी तुम्हारी चिन्ताओं का मूल है
हे ब्लागर, क्यों व्यर्थ कचरालेखन से डरते हो
तुमको यहाँ से कौन तुम्हें निकाल सकता है
किंचित से अधिक कौन क्या उखाड़ सकता है
फिर क्यों निज-ब्लागकर्म से बिदकते हो
सतत आवागमन ब्लागिंग का नियम है
जिसे वह नियमितता कहते हैं, यही तो माया है
एक गुट में तुम हिट ब्लागर और चहेते स्टार हो
दूसरे गुट में तुम जुगाड़ू ब्लागर और उनका धिक्कार हो
टिप्पणी चटका औ’ पसंद अपने मन से मिटा दो
फिर तो ब्लागर तुम्हारा है, तुम ब्लागर के हो
ना ये स्टैटकाउंटर पोस्ट रेटिंग तुम्हारे लिये है
न तुम इनके लिये हो यह सत्य मान लो
बस तुम अपने को ब्लागिंग को अर्पित कर दो
मत करो तुच्छ टिप्पणियों की चिन्ता
केवल नित एक बकवास लिखते जाओ
हिट होने का यह गोल्डेन ब्लाग-रूल है
जो इस ज्ञान को धारण करता है, वही सुखी है
सक्रियता धाक हवाले यह सब ब्लागिंग के बँधन हैं
तुम इनसे मुक्त रहो और यह घटिया पोस्ट ठेलो
निट्ठल्ले क्षणों का शून्य विचार यहाँ बरबस उड़ेलो
विचार शब्द शिल्प तुम कुछ भी तो साथ न लाये थे
तेरा अन्य ठौर कहाँ, लौट कर तो तुम्हें फिर यहीं आना है
अपने विचारों को शून्य में अर्पित कर दो
फिर तो ब्लागर तुम्हारा है, तुम ब्लागर के हो
हे ब्लागर, ब्लागिंग का यही सतत नियम है
14 April 2009
ने टाइम खोटी किया Tuesday, April 14, 2009 | 13 टिप्पणी | कार्टून एडिटिंग, निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, बुरबकई, संदर्भहीन व्याख्यायें
देसी मायने-ज़मेन्ट गुरु, आज किये खुलासा
सुना है, आज शाम IIM के पुरफ़ेसर लोगों को भी चारा चटा देने वाले श्रीयुत लालू प्रसाद यादव ’ जी ’ ने अपना चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद एक प्रौस-कानफ़िरेन्स बुलाया था । जिसमें उन्होंने जेपी अन्दौलन में अपने जेल जाने के अलावा.. देश के लिये किये गये अन्य त्यागों का भी ख़ुलासा किया ! चैनल वालों की तरह.. अपनी तो नमक मिर्च लगाने की आदत नहीं, सो.. पूरा ब्यौरा ज्यौं का त्यौं पेश कर देता हूँ !
हम आप लोग का इसलीए बोलाया हूँ, के आपका ई मेडीया में एक दू ठो बुरबक भाई.. ऎ हाल्ला मत मचाईये, बताता हूँ.. सब बताता हूँ..खुलासा करता हूँ.. हम ईहाँ दुध का दुध अउर पानी का पनिये करने को बईठें हँय न ? बाकी जनतवा तो सब देखबे करती है.. ऊसको भी आपलोग में से एगो दुगो भाई भरम में डालने का कारज करती है.. त ऊ बुरबकै कहायगा के नहिं ? जो पत्तरकार सेन्सीटीव ईस्यू सब को आईडेन्टिफ़ाई नहिं करता है,ऊ सब जो अडवनिया के अईसा फ़ासिस्ट बिचारधरा बाला डैन्ज़रस आदमी का पईसा खाके पता नहीं काहाँ काहाँ से झुट्ठा खबर सब उड़ाता रहता है ।
ई लोग कहता है के हम जनता का भरडिक्ट पर गोबर लीपने के मँसा से पासवान से हाथ मीलाये हँय ।आप जनबै करते हँय के देस का.. हमारा पवित्र लोकतंत्र का रच्छा कोनो तिरसँकु पाल्टी .. हँग पोज़िशन में नहीं न कर पाएगी.. अऽऽऊ जौन जौन पाल्टी सब अपने टँगाया हय त ऊ देसवो को टाँग देगा ।
त बाद में लोकतन्तर का सौदा ऊदा करने का लीए अपना बँटखरा का भारी होना ज़रूरी हय के नहिं ? बाकी इसमें आउर कोनो बात नहिं है । उधर मायावती से घबड़ा के मुलयमवौ हमरे सरण में आ गये त सरनागत को कईसे दुत्कारेंगे, धुत्त? देखीये उल्टे हमारा वोज़न 150 ग्राम से बढ़ कर 200 ग्राम होगया.. त राजनिति एहि कहता हय के अपना फाएदा देखो.. त आपस का चुनावी मेलजोल में कउन बेजा बात ?
आज एक नाया बतिया सुनते हँय, के हम चारा खा के रेलगाड़ी चलाने के अलावा देस के लीए कुच्छौ नहिं कीआ ! आप सब बुड्ढीजीवी किलास से आते हँय.. हमरा मैनेज़मेन्ट को बड़ा बड़ा देस सब मानता हय , लन्दन से एगो चीठी आया केऽऽ.. आप अप्लाई करीए.. अपका नौकरी ईहाँ तैय्यार हय । हम फारमालीटी का लीए अप्लईयौ कर दीए.. ऊ हमको भर्ती का चीठी भि भेज दीआ.. लेकीन हम देस के वास्ते इसको ठोकर मार दीया ! हम एतनाऽऽ मँदी में एगो लुकरेटिव नौकरी को ठोकर मार दीए.. अउर ई पूछता है.. देस के लीए का किया.. त हमरे लीए बुरबके हय न भाई ?
देखीए ई चीठी.. ई त अंगरेजी में हय... बिदेसी भशा में हय.. हम आपको सोझे इसका हीन्दिये में ट्रान्सलेसन कर के सुना देते हँय ! सुनिए.. अऽऽ काल्ह के समचार पत्र में ठिक ठिक रीपोटींग कीए त हम भि आपका सेवा पानी में कसर नाहिं रखेंगे..
Dear Mr. Laloo Prasad ..... प्यारे लालू परसाद भईय्या
We are sorry ......हमसे गलती हो गयी
to intimate you that ......... आपको ई बताना हय के
You do not meet ---- आप तो मीलते हि नहिं हो
our requirement ---- हमको जरूरत हय.. नोट करीए ई लीखे हँय.. इनको जरूरत हय
Please do not send any further correspondence ---- अब आगे से लेटर वेटर भेजना के कोनो जरूरत नहिं
In future no phone call ---- भबिशय में फूनवा करने का भि जरूरत नहिं
shall be entertained ---- बहूत खातीर की जाएगी.. माने हमरा .. याने भारत देस का एगो चरवाहा का .. देखिए कि बहूत खातीर की जाएगी
Thanks ----आपका बहूतै धनबाद
अब जाईए.. आप लोग पिरेम से छक के चा नास्ता करीए, हमको लोकहित में एगो दोसरका बयान सोचना है !
निट्ठल्ला संवाद सेवा का जनहित स्कूप : Exclusively on Blogspot dot com
12 April 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, April 12, 2009 | 6 टिप्पणी | उनकी टिप्पणियों पर, कवितायें, बुरबकई, संदर्भहीन व्याख्यायें
ऎई , आज फिर निट्ठल्ले पर हो क्या ?
शिवभाई का मेसेज़ आया.. यदि मैंनें कुछ लिखा नहीं, तो वह कवितायें लिख लिख कर ब्लागजगत में तबाही मचा देंगे ! सो, मैं सनद्ध हुआ, कि यह यंत्रणा मेरे को ही झेल लेने दो, भाई ! नीलक्ण्ठ बन जा ब्लागर अमर कुमार ! कविता ही तो लिखना है.. कुछ लिख मार, लोगों के समझने के फेर का मौका उठा ले ! बड़े मौके हैं, पोयट्री फ़ील्ड में .. किसी को धता बता दो.. आप नहीं समझ सकते , मेरी कवियायें ! यह लोकधर्मी है.. प्रयोगधर्मी है.. या अधर्मी है.. इनके बीच की एक बारीक रेखा आपके.. ना ना आपके बस की नहीं है, आपके बस की नहीं है, भाई साहब ! लीजिये !
एक समय हिन्दी साहित्य में दाढ़ीवादी युग आया था ! चिकने चुपड़े पंत जी, और छितरी दाढ़ी खरखराते मिज़ाज़ के निराला जी ! कवि का मिज़ाज़ दूर से ही पहचाना जाता था, दाढ़ीवादी.. मायने प्रगतिवादी याकि यथार्थवादी .. बिना दाढ़ी वाले प्रेम के अग्रदूत प्रकृति के सौन्दर्य को निहारते वाज़िद अली टाइप ! समीरलाल ’ समीर ’ जी तो आधी दाढ़ी वाले है.. वह होते तो भला किन वादियों की कतार में बैठाये जाते ? शायद तभी उनकी मोतियाँ शुरुआती संग्रह में ही बिखर सीधे शीर्षक ही बन गयी होंगी ? मेरे तो बचपन से ही पेट में दाढ़ी रही है, कविता अब तक मुझसे इतनी दूर रह कैसे सकी ? आज मुझसे कविता लिख ही जायेगी, ब्लागिंग की बात पर.. शिवभाई के हाथ पर ! क्योंकि आज मौका है, क्योंकि आज ही शनिवार भी है, और.. आज मेरा साप्ताहिक त्यौहार है ! जय हो शनिदेव जी की ! प्रारंभ किया जाय ?
सो, शिवभाई की माँग पर सबसे पहले एक गड्ढा खोदा । अपने या आपके लिये नहीं, कविता के लिये ! कविता का झँडा .. जो टँगा जा रहा आजकल ब्लागर के डँडे पर ! कोई सोच भी रहा है, गाड़ने की कोई जुगत नहीं ? चलो, मैं ही गड्ढा खोदने का जुगाड़ लगाऊँ ! आने वाली पीढ़ियाँ आराम से अपनी अपनी कविता का झँडा गाड़ने आया करेगी ! जो चूक जायेगा, उसके पास झँडा न सही डँडा तो रहेगा, एक दो की इतिश्री करता रहे.. कवियों की ज़मात भी कम होगी ।
किचेन से कढाई में कलछी की टँकार.. बार बार लगातार आ रही है । अभी बताया था न, कि आज साप्ताहिक त्यौहार है ! इसमें भी ख़लल पड़ गया । तो… किचेन से कढाई में कलछी की टँकार के पार्श्वसंगीत के संग एक कोकिला की आवाज़ गूँजती है, " ऎई , आज फिर निट्ठल्ले पर हो क्या ? "
मेरे लिये लोग क्या सोचते होंगे, मैं नहीं सोचता ! अधिकतर यह पति के विषय में सोचने सधाने का काम पत्नी रूपेण संस्थितायें ही किया करती हैं ! सो, मेरे टुटपुँजिया लेखन के रहे सहे स्तर को निट्ठल्ला तेजी से निगल रहा है.. ये ऎसा सोचती हैं ! फिर तो मुझे भी सोचने का रिफ़्रेशर करना पड़ता है .. क्योंकि मैं इन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्रेमपत्र दे अपने हाथ से ( खूँ से..? ना बाबा ना ) लिख कर दे चुका हूँ ! बदले में क्या मिला.. एक बीबी ? पर, यह सब निजी बातें हैं !
मैंने तपाक से पेज़ बन्द किया.. चिट्ठाचर्चा का रुख लिया !
यह क्या.. भाई लोगों ने यह अपने प्रिय फ़ुरसतिया का यह हाल बना दिया, कि आज लगभग रोने रोने को हैं ! इन्होंने मेरी इतनी टिप्पणी हज़म की है.. कुछ तो करना पड़ेगा । क्या करें.. साइडबार में सजे लोगों को एक लाइन में खड़ा कर चर्चासिलीन के सूई की एक एक डोज़ भोंक दें ? या फिर एक रस्मी टिप्पणी कर के फूट लें ?
टिप्पणी तनिक लम्बी हो गयी.. लाओ यहीं सहेज दें । नये मकान का गृहप्रवेश भी हो जायेगा ! पंडिताइन बोलीं.. " ऎसा मत करो.. अभी खरमास है ! अपने टोस्ट विद टू दोस्त पर अपना ज़ुलूस भी देखने न गये, वही देख आओ ! मुझे पता है, वहाँ बेभाव की चल रही होगी लगता है यह अब तक पहचान नहीं पायीं, मुझे.. " मुझ जैसे खर को खरमास की क्या चिन्ता ? "
तो चलें.. चर्चा-टिप्पणी पर ? भले ही, मत मानें मेरा मत, पर यह तो न कहेंगे कि समय पड़े मैंने मत न दिया था !
जाते जाते.. आज ब्लागर पर ही एक प्रोफ़ाइल देखा, सो मेरी कवितिया भी उछलने लग पड़ी ! मैं तो सरम से लाल हो गया. छिः घास ही खोदा तैंनें, आज तक ! जरा इनको देखिये ! नाम गाम तलाशना आपका काम है !
| “ कविता के बीज मेरे मन में कब गिरे और कैसे फलित हुए, ठीक-ठीक नहीं कह सकता । किन्तु जनपदीय धूल-धक्कड़ से सने श्रमशील श्वांसों में धड़कते अपने लोकजीवन और समय के स्पंदन को कहीं महसूसता हूं तो वह कविता में ही, क्योंकि वह मुझे बेहद भाता है जहां कि मैं जन्मा-पला हूं । मैं समझता हूं , कविता सिर्फ़ अंतरतम की पिपासा को ही तृप्त नहीं करती , बल्कि दिन-दिन अमानवीय हो रही व्यवस्था पर अनिवार्य आघात भी कर सकती है, करती है। सौम्य-शांत जीवन जिसमें संघर्ष की स्वीकृति हो, मुझे पसंद है। कृति और प्रकृति से मुझे प्यार है, आत्मानुशासन से लगाव पर प्रशासन-व्यवस्था ,राजनीति और कृत्रिमता से आले दर्जे की नफ़रत । “ |
यही… बस यही बीज मुझे मिल जाता तो ? फिर, ऎसी कुंठित पोस्ट तो न लिखा करता । आप झेल गये वह अलग !
6 April 2009
ने टाइम खोटी किया Monday, April 06, 2009 | 14 टिप्पणी | कभी कभी मेरे दिल में, बात बेबाक, मिनी पोस्ट
एक शाम अपने कुकूर जी के नाम
आज शाम मैं अपना कुत्ता चराने निकला.. वह मुझे रोज ही शाम को घुमाने ले जाता है ! कोई चारा न देख मैं बेचारा टिगीड़ टिगीड़ चाल से उसको फ़ालो करता रहता हूँ ! इस दौरान मन ही मन कई पोस्ट लिख चुका होता हूँ, लौटते समय टिप्पणियाँ समेटते समेटते घर के पास वाले नुक्कड़ पर ढेर सारा धन्यवाद उड़ेंलना जैसे नियम हो..
यह निजी बातें हैं, आपको क्या ?
आज एक ज्ञानोदय होता भया । इस ज्ञान का उदय तो नित्य ही होता रहा होगा, बट आई कुडन्ट नोटिस ! माहौल का बहुत ही फ़र्क पड़ता होगा न ? क्योंकि आज इस ज्ञानोदय की किरणें बरबस ही दिमाग में प्रविष्ट कर गयीं ! मुझको ज्ञान मिला, इससे आपको क्या ?
सुना किया है कि, ज्ञान बाँटने से बढ़ता है.. सो थोड़ा थोड़ा आप लोग भी लेते जाइये । नहीं भी लेंगे, तो मेरा क्या ?
दिन भर नामांकन की गहमागहमी रही, मेरा कोई लेना देना नहीं, फिर भी यह सब देख थकान हो रही है...फिर भी फ़र्ज़ निभाने की रस्म निभाने को ही सही, मैं आज फिर कुत्ते के पीछे पीछे घूमने निकल पड़ा.. मेरी तो समूची दुनिया ही इस ’ फिर भी ’ पर टिकी है ।
तो, मैं अपने कुकूर को फ़ालो कर रहा था ! रास्ते में एक जगह बकरियों का झुँड आराम से अपने घास-पानी में लीन था, कुकूर की आहट से सब चौकन्ने, चकित से ठिठक कर गुटुर गुटुर निहारने लग पड़े । फिर क्या था.. कुकूर महोदय को हठात ही अपने को श्वान से व्याघ्र होने का ज्ञानोदय हुआ । और.. और वह आखेट को सनद्ध हो उस झुँड में कूद पड़े.. बकरियाँ इधर उधर भागने लग पड़ीं.. बेचारी मिमिय़ाने के अलावा कर ही क्या सकती थीं !
हमारे नव-व्याघ्र महोदय दहाड़ने का स्वाँग करते हुये लपक पड़े । आदतन दुम भी हिलती जाती.. उनके भौंक में जितना जोर आता, पूँछ भी उतनी ही लहराती । उनके भौंक में जितना था दम.. सो उनके पूँछ में भी उतने ही थे ख़म
मेरे भीतर का मौज़ी लाल निट्ठल्ला यह देख हँस पड़ा... बेटा आवाज़ चाहे जितना बदल लो.. जाति का असर जिनको न दिख रहा हो.. न दिखे, मुझे तो तेरी जात दिख रही है । चल लौट.. काहे सुने ससुरा.. चल लौट.. काहे सुने ससुरा ! काहे सुने, जब वह मीट बैंक में टहल रहा हो ! तितर बितर हो कुछ बकरियाँ सड़क के इस पार.. तो कुछ सहमी सी सड़क के उस पार , यह देख श्वान-शिरोमणि हुये गदगद निहाल ! लौट पड़े संतुष्ट.. मैंने डपटा जिसका मीट चिंचोंड़ता है.. वहीं बहादुरी दिखायेगा, कुत्ता कहीं का ?
इतने दिनों का पाला पोसा है, इससे ज़्यादा कुछ कह भी नहीं सकता, वह बाहर का ख़तरा दिखा कर मेरे ही ऊपर भौंकने लग पड़े तो ?
पर कुत्ते ने यूँ पहचान लिये जाने पर ज़मीन तक अपनी जीभ लटका दी, और जैसे नतमस्तक हो कुँकुँआया, " पर मैं तो मौके बेमौके दुम भी हिला रहा था, यह क्यों न देखा आपने ? " मैंनें बड़े जतन से पाला है इनको, ज़नाब ! उसके यूँ सरेंडर कर देने पर मेरा मन भी पिघल गया, मेरा ही तो नमक खाता है.. चलो थोड़ा डाँट कर छोड़ देते हैं ’ चल हट, बातें बनाता है, नेता कहीं का ! रोटी बोटी देखते ही जिस किसी को स्वामी बना लेता है, धूर्त ! "
अँय, मैंने नेता कहा क्या..? हाय राम, यह क्या कह दिया ! जो भी हो, आप यह मान कर चलें आपने पढ़ा ही नहीं ! गँदगी निहारा नहीं करते ! लो निट्ठल्लेपन में एक और शाम ढल गयी !
अब बेलागिंग का खमियाज़ा भरो.. आप बताइये टिप्पणी ऊप्पणी करके आप लोगों से जान पहचान किस टैम बढ़ायें ?
अब कल की पोस्ट पर, कुछ पान इलाइची !
@ यह अश्लील तो नहीं बल्कि गँदगी है,
और, पाकिस्तान को तो गँदगी के समानार्थी विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है,
अब तो उसे वैश्विक स्तर पर गँदगी की मान्यता भी मिल चुकी है..
मैंने विभाजन तो देखा नहीं, पर उसकी ख़लिश / तपिश आज तक मौज़ूद है.. महसूस होती और होती रहेगी !
बर्लिन की दीवार तो कबकी टूट चुकी, हम ही क्यों नाहक अभी तक सैन्य प्रतिस्पर्धा में हलाक़ हुये जा रहे हैं..
खाया पिया वहाँ डाल आते छिः छिः छिः
सब बरबाद … फ़ार द सेक आफ़ पाकिस्तान !
दैट वाज़ द सोल आफ़ दिस चुटकी !
5 April 2009
ने टाइम खोटी किया Sunday, April 05, 2009 | 13 टिप्पणी | निट्ठल्ले का फोटोब्लाग, बुरबकई, मिनी पोस्ट
मेरे राहत का सबब है, मेरा पाकिस्तान
कोई इसे ग़द्दारी न समझ लेना, मेरे ख़ातिर तो राहत का सबब है, मेरा पाकिस्तान ! यह सरज़मीं मानो ज़न्नत की सिफ़त रखता, जो कहलाता है पाकिस्तान ! कितनी ग़लतफ़हमियाँ बनी रहतीं जो मैं कभी न जा पाता अपने पाकिस्तान !
मेरे हालिया पाकिस्तान यात्रा की तस्वीरें यहाँ देखें, और बतायें कि पाकिस्तान कितनी बड़ी ज़रूरत है, सच्ची..नो किडिंग !
4 April 2009
ने टाइम खोटी किया Saturday, April 04, 2009 | 8 टिप्पणी | एक साफ सुथरे दिमाग की, कार्टून एडिटिंग, बात बेबाक, मिनी पोस्ट
यह आख़िरी बार बताता, तुमकूँ
वनगमन से लौट आने की व्यथाकथा जारी रहेगी, इससे पहले वहाँ मिला एक महत्वपूर्ण स्कूप बता देना राष्ट्रहित में है ! इसलिये आमोद प्रमोद की इस दुनिया में ’ देशहित ’ का एक ब्रेक लेने की अनुमति चाहूँगा ! अईयो साईं आला रे आला ने बहुसंख्यक राष्ट्रीय पशुवत जनता को दूसरे पायदान पर और अल्पसंख्यक होते जाते राष्ट्रीय पशु बाघ की प्राथमिकता को ऊपर क्या रख दिया.. फर्रोसै देश में मज़ाकिया एस. एम. एस. का सैलाब आया हुआ है ! हरदम जलते रहेंगे, मुये !
वन में आनन फ़ानन देश को बरबाद करने में माहिर निट्ठल्लों के दस्ते ज़ोश में आ गये है ! आ गये तो आ गये, आप?
वही तो ? मैं यूँ ही निट्ठल्ला बैठा हुआ बिनावज़ह कुड़कुड़ाया करता हूँ ! हमारा घर है, हम चाहे तो इसमें आग लगा दें, तुम्हें क्या ? घर के चिराग़ यूँ ही गुल हुआ करें, शहर में तो रोशनी आयेगी ! अरे ? यह तो एक मिसरा तैयार हो गया !
1 April 2009
ने टाइम खोटी किया Wednesday, April 01, 2009 | 17 टिप्पणी | उनकी टिप्पणियों पर, कुछ ख़ास मौकों पर, बुरबकई
अनूप जी लताड़े गये – बिहार की जनता को राहत
आम तौर पर पोस्ट लिखने बाद इनको टिप्पणी देखने गिनने की ज़रूरत नहीं पड़ती ( या कहिये कि इतनी फ़्लाप पोस्टों के बाद शर्म और डर से न जाते होगे ! ) कल रात की पोस्ट प्रकाशित होने में नेटवर्क बहुत दोस्ताने तरीके व्यवहार नहीं कर रहा था ! कारण जो भी हो, यहाँ बताना उचित न होगा, कि ऎसा किन्हीं पहुँचे हुये स्वनामधन्य ब्लागर की ब्राडबैन्ड वालों के मध्य रसूख़ के चलते हुआ है ! संजो कर सुबह प्रकाशित करने का मन बनाया..सोने चला गया !
सुबह इसको प्रकाशित करने गया तो, देखा कि पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है ! यह कैसे हुआ ? यह चिट्ठाचर्चा के लिये एक नये विवाद का माल है ! शायद सर्वर एरर की वज़ह से तीन टिप्पणियाँ भी भटक आयीं थी । आनन फानन इनका उत्तर देकर, अपनी दावेदारी मज़बूत करने की ग़रज़ से उसी में उलझ कर रह गया !
अभी क्लिनिक से लौटते ही नित्य की भाँति अपना बैग पटका, कम्प्यूटर आन किया.. और हालचाल लेने सीधे अम्मा के पास पहुँचा । एक क़ाफ़ी पियूँगा.. इतनी सारी बातें पंडिताइन से भी करनी पड़ीं ! फिर फ़ेवरिट का बट्न दबा कर चिट्ठों की चर्चा को खोला । आशा के विपरीत बिना कोई मज़बूरी जताये अनूप जी ने कुश के आने के पहले ही चर्चा पकड़ ली थी, और ढेर सारे ईर्ष्याग्रस्त कीबोर्ड-प्रेमियों का लिंक देकर सटक गये थे !
यहाँ यह नोट किया जाये कि यह लिंक पकड़ा कर स्वंय दफ़्तर चले जाते है, बाकी जन इनके पीछे लिक पकड़े पकड़े दिन खराब किया करते हैं । साथ ही श्रीमती कविता वाच्क्नवी, डाक्टर के बारंबार चेताये जाने पर भी यह कार्यालय नहीं जाते बल्कि घर से निकल कर सीधे दफ़्तर चले जाते है !
टाइम के टोटे वाले एक टाइमखोटीकार ने झल्ला कर इनको लताड़ दिया । हालाँकि यह टाइमखोटीकार खुल्लमखुल्ला भरे बाज़ार में डा. ( डाकू ) अमर कुमार का बोर्ड टाँग कर लूट का धँधा करते हैं, पर हर फटे में टाँग अड़ाना इनका शौक है !
अपने गिरेबान में न झाँकते हुये इनकी टिप्पणी करने की कुटेव से त्रस्त इनकी धर्मपत्नी पंडिताइन जी ने उन्हें इसप्रकार अनूप जी को लताड़ने से बरज़ दिया ! श्रीमान जी, भाभियों के चहेते बन सभी मुख्य ब्लागरों के घर में ग्लोबल वार्मिंग की तरह ख़तरा बन मँडरा रहे हैं ! पंडिताइन के सो जाने के पश्चात किसी प्रकार यह लताड़ प्रकाशित की जा सकी है ..
टि :
इतनी हुल्लड़ के बाद अब इस भुनगे की नसीहत भी लेते जाओ, गुरु !
यदि समय न रहा करे, तो चर्चा किसी और को थमा दिया करो..
यहाँ चर्चाफ़ूलों की ज़मात खड़ी है, कतार में
देखिये जरा उधर अपने ही लगाये साइडबार में
अरे यहाँ नहीं वहाँ.. चिच चिच चिच चिट्ठाचर्चा पर
आखिर आपको ही क्या ज़रूरत थी
आज होने वाले सभी सम्मान समारोहों की अध्यक्ष्यता का बयान लेने की ?
कम से कम आज के दिन अपनी यज़मानी समीर लाल, शिवज्ञान बँधु में तो बाँट ही सकते थे ?
बताओ आपकी छत्रछाया में आज के शुभ दिन ताऊ हुक्का गुड़गुड़ाते रह गये..
इतनी मोनोपोली ठीक नहीं हैं,
जरा उभरते हुये फ़ूलों को भी खिलने का मौका दो
यह.. यह..
यह अच्ची बात...
नहीं है !
उधर प्रशान्त प्रियदर्शी नाम के एक ब्लागर ने अपने टूटे पैर से ब्लागिंग न कर पाने की असमर्थता जताते हुये बिहार से सम्बन्धित एक सकारात्मक निर्णय का bbc.co.uk/hindi का एक महत्वपूर्ण लिंक भेजा है । लगातार टूटन से त्रस्त टाँग के इस मालिक के भेजे लिंक का आप यहाँ अवलोकन कर सकते हैं । आज ब्लागरों के राष्ट्रीय पर्व पर यह लिंक उनके लिये महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है ! देखिये चाहे न देखिये.. आपकी मर्ज़ी !
ने टाइम खोटी किया Wednesday, April 01, 2009 | 15 टिप्पणी | उनकी टिप्पणियों पर, एक साफ सुथरे दिमाग की, यह कोई तक़ल्लुफ़ नहीं
जाते थे वनगमन को, हेरन लागे जुगाड़
यूँ ही निट्ठल्ला.. यथानाम तथागुण ! कहीं दूर क्यॊ जाते हैं ? पिछली पोस्ट की प्रकाशन तिथि देख लीजिये... आज की डेट से डिफ़रेन्स जोड़ लीजिये, फिर मेरा योगदान घटा दीजिये.. यही है.. निट्ठल्लई ! इधर बड़ी साँसत रही, क्या लिखें.. क्या छोड़ें ? चलो असमंजस छोड़ो.. अच्छा है कि कुछ भी न लिखो । नीरज के नाती से लेकर परसाई के पोते तक, सभी तो कुछ न कुछ योगदान दे ही रहे हैं.. अपुन काहे को मेहनत करें ? वैसे भी कुछ तो सक्रिय होते ही निट्ठल्लई सवार हो जाती है.. बाई द वे यहाँ बहुमत भी हम निट्ठल्लों का ही है । सो, करो धरो कुछ नहीं, किसी के टिप्पणी बक्से में पैठ कर थोड़ा शोर मचा आओ.. काम ख़त्म ! ब्लागर पर अपने होने के ऎहसास दिलाने को इतना ही काफ़ी है !
" ऎंवेंईंवईं.. वईं वईं येतना ही क्याफी है ", पंडिताइन आवाज़ कस कर निकल गयीं, वह अभी भी जारी हैं.. " लोग यहाँ अपने होने का एहसास दिलाने को ग़ज़ल, तुक्का.. यहाँ तक कि कविता भी रच देते हैं, और तुम ब्लागिंग में तड़ से ढँग की दस लाइन भी नहीं जड़ सकते.. येतना ही क्याफी है, हुँह । "
इनका धीरे से झटका भी जोर का ही होता है, सो चुप्पी मार गया.. वरना उनकी कलाई में दर्द हो जाये.. और हमें रोटी बेलनी पड़ जाये,.. .. दिन भर बाहर पापड़ बेलो.. घर में बेलो रोटी ? लिहाज़ा उन्हें खुश करने को एक कविता लिखने का परयास करने लगा ( इतने परयास पर भी तो एक कयास लग ही गया.. वह बाद में बतायेंगे मास्टर साहेब ! ) कुल ज़मा यह कि हमरी कवितिया अपूर्ण रह गयी.. प्रयास करने का प्रयास कर ही रहा था, कि अनूप जी जल्दी से एक्ठो टिप्पणी दे दिये, 'अजी कविता बन के पड़ी है' मेरी कविता के पूर्ण होने से पहले ही हाथ दे दिया, थाँबा !
क्या बात है, टिप्पणी.. टिप्पणी आई वह भी अनूप भाई की ? समझो कि आपकी पोस्ट पर मोहर है चिट्ठा लाट की ! लेकिन हम बूझ गये.. ज़रूर कहीं कोई कसर है, तबहिन अनूप एक टिप्पणी निकाले हैं.. व्यंग्यकार के मुखारविन्द से निकसे तारीफ़ में भी मुझे थोड़ा खुटपुटा टाइप का संशय बना रहता है ! इस माफ़िक का मर्म बूझते ही हम भी बुझ गये.. अरे गुरु, सुधार की ग़ुंज़ाइश तो बताते जाते.. कि इस कविता के चक्रव्यूह में आपौ हमरे ही तरह अभिमन्यु हो ?
किसी का पीछ करते हुये, हमरे मास्टर फ़त्तेपुरी साहेब पधारे, अभिमन्यु खेत होते रहे.. उनकी एक '...हींऽऽऽ' में अपनी तो हींऽऽ हो गयी.. सो, छिटक गये । कविता से हाथ धोये, ब्लागर से नाक पोंछे और कम्प्यूटर के सामने बैठ कर डिपरेस हो गये । डिप्रेसन में भी पापी मन को एक डर सताने लगा कि सक्रियता से तो तुम अपने को बचा ले गये.. पर इस तरह बैठ कर निष्क्रियता में यदि बाजी मार ले गये तो ? मन तिनिन बिनिन करने लगा.. चड्डी की गुलाबी बयार के सदमें से बाहर आये हो.. तुमने फगुनहट भी ठीक से एन्ज़्वाय नहीं किया और ई लेयो, रा रा रा रा धड़ाम ?
डिपरेस क्यों है, कुछ लिख.. सभी तो ‘ कुछ ‘ लिख रहे हैं । तुममें तो चुनावी चैतन्यता भी नहीं दिखती.. मेरे मन ने धिक्कारा । अपनी एक अधूरी पोस्ट ‘वैलेन्टनिया कहाँ छोड़ आयी हाय मेरी गुईंयाँ’ से माफ़ी माँगी, तेरा सीज़न बीत गया वैलेन्टाइन बहना, तुम समझती है ना, कि हम ब्लागर लोग सीज़नल प्राणी हैं.. अप्रैल मई जून के मौअसम के हिसाब से लिखते हैं.. सो अभी पड़ी रह, अगली फ़रवरी तेरे दिन फिर बहुरेंगे !
चल भाई निट्ठल्ले, मन की सुन.. मन की आवाज़ पर तो लालू पासवान खुल्लमखुल्ला इज़हारे प्यार कर बैठे, तेरे को तो फ़कत एक पोस्ट लिखनी है.. मीडिया बाघ या हाथी जिसकी भी टीपीआर वैल्यू बढ़ाने को है, तू उसी को लपक ले.. उनके विरोधी और समर्थक दोनों की टिप्पणी भी पक्की मान ले । आहः यह कैसा ज्ञानोदय ? फिर तो किलक उठा यह मेरा मन हुआ, " मौज़ा ही मौज़ा " चल उठा तो अपना माउस.. निपटा दे इनको.. ये फ़र्ज़ी शेर क्यों दहाड़ रहे हैं ?
ब्लागर अमर कुमार सन्नध हुये, जाँच कमेटियों की रिपोर्ट की तरह ही रजनी बाबा के गठबँधन का चैतन्यचूर्ण कल्ले में दबाया.. सीने से दो फीट की दूरी पर कीबोर्ड.. निगाह स्क्रीन पर.. दायें हाथ में माउस को तौलता हुआ दिमाग को हुदकाने का प्रयास करने लगा । फिस्स.. दिमाग ने चेताया अबे ओये, कहाँ फँस रैया है ? गणतंत्र की ग़र्ज़मंद जनता के वोट बाद में तौलना.. पहले नेता के नियत का खोट तौल.. नेता जितना कठोर भी नहीं है, सो मेरा मन असंयत हो गया
आओ, अपने को संयत करने को थोड़ा गूगलिंग कर लिया जाय । ईहाँ भी छींक हुई गयी, इसी समय हिन्दी वालों के लिये एडसेन्स ! गूगल गोसाँईं के इस हृदय परिवर्तन का मतलब ? भारत में चुनाव के समय दो रूपये किलो चावल की घोषणा तो होती ही रहती है.. पर ऎन चुनाव के समय हिन्दी को एडसेन्स के झुनझुने से गदगद कर देने का मतलब ? जा नहीं लिखता तुम नेता लोगों के वोटों के आखेट पर... जहाँ घोषणा है, वहाँ घूस है !
और यही तो अपुन को जमता नहीं ..
पहले अधूरी कविता.. फिर मास्टर..फिर चड्डी..फिर फ़ाग.. फिर मास्टर.. नहीं फिर.. फिर यही कि, पोस्ट का वर्ड काउंट बढ़ रहा है, रतलामी भाई का बीपी चढ़ रहा है । इसके आगे के फिर के लिये नीचे देख लीजिये सब गड्ड –मड्ड !!
ऎई, बैठे एकटक क्या देखे जा रहे हो ? ज़ल्दी से.. एक्ठो ढँग का कुछ लिख डालो, और भी काम हैं कि नहीं ?
यही तो ? समझती नहीं हैं, मुझे ज़ल्दी शब्द से ही उच्चकई का आभास होता है.. और ठेलने से ? जाने दीजिये साहब !
ग़ैरसली्के का पोस्ट भी सलीके से प्रकाशित करो, तो धीरे में जोर का झटका आता है ! यह कह रही हैं, ज़ल्दी से.. हुँह !
मन एकदम्मै विरक्त होय गया, वैलेन्टाइन के शौहर अपनी दूसरी अधूरी पोस्ट 'एक ब्लागर की मौत ' को गले लगाया.. अगले जन्म में मिलेंगे.. और पक्का 120 तोंदियल बाबा के साथ रज़नीगँधा को बगल में दाब वनगमन को चल दिया !
आगे बढ़ें ? शब्द 3447 हो गया है.. नियम कितने वर्ड-काउंट का जारी हुआ है, कोई बतायेगा ? उधर कबीर बाबा पल में परलय होने की चेतावनी भी दे रहे हैं ! आगे ही बढ़ते हैं, प्रलय के समय किसी का कोई नियम नहीं चलेगा .. आप प्रलय के बाद भी पढ़ लेना ! ऎस मौका मिलता रहेगा, क्योंकि हिन्दी ब्लागिंग के भाईचारे में अपने को भाई और दूसरे को चारा ठहराने की प्रलय अक्सर ही मची रहती है । मैं तल्ख़ हो रैया हूँ क्या.. ऊई माँ, ये मेरे कीबोर्ड से क्या निकल कर भाग रहा है ? फिटेमुँह, जब तब मुझी को कटघरे में क्यों घसीटवाता है ? देखियेगा, विषयांतर न होने पाये !
जारी है.. वन का रास्ता कटने में ही नहीं आ रहा था । दोनों ओर ब्लागर बस्तियाँ गझी हुई हैं.. मकान ज़्यादा है जनसंख़्या कम है ! जोगी ज़्यादा हैं मठ कुछेक ही रह गये हैं.. कहते हैं न, कि ज़्यादा जोगी से मठ उजाड़.. सो वही ! कोई पानी देने वाला भी नहीं, एक कुआँ तलाश लिया.. पर यह क्या ? इस कुयें में भाँग पड़ी है, या मुझे ही चढ़ी है ?
अर्थ का अनर्थ न कीजो, प्रभु जी.. कसम एनलिल की यह हमारा खोदा हुआ ब्लागिंग का कुआँ नहीं था..( ऎसी छोटी कसमों के लिये मैं अपने संकटमोचन को तक़लीफ़ नहीं दिया करता ).. अब चलें.. गूगल टाक के डिब्बे से कुश बार बार उचक कर संदेश कर रहे हैं..“ आओ श्रीमान, क़हवा का यह एक सौ एक्यावनवाँ कप तो ग्रहण कर लो, शीतल हो रैली है.. डेढ़ सौ प्यालियाँ तुम पहले ही बरबाद करवा चुके हो गुरुवर ! “ पण इह तरियों गुर्रा के तो न बोल गुर्रुबर !
मैं यहाँ ख़्वामख़्वाह ब्लागिया रहा हूँ, क्योंकि मुझे इनकी बड़ी चिन्ता है, ईश्वर इनको सार्थक उम्र दे..काहे कि दो डाक्टरन के बीच में ज़िन्दा बचा न कोय ! जरा देखें तो, इनके क़ाफ़ी में कौन सी कीमियागिरी है, जो अच्छों अच्छों से सभी सच कबूलवा लेती है, यानि इस क़ाफ़ी की पात्रता के लिये झूठ का होना अनिवार्य है.. देखाऽऽ शिवभाई, मेरा नम्बर आपके बाद में ही लगाया इस नम्बरी ने ? लेकिन फिर इसने लावण्या दीदी को क़ाफ़ी आफ़र ही क्यों की ? देखो अभी नमकीन बनाता हूँ, इनमें से एक दोस्त का.. जोधपुरी नमकीन के कच्चे माल के रूप में कुश ही फ़िट हैं, मन्नै तो ऎसा लाग्यै !
इसी फ़ाइनेन्शियल ईयर में पी लेता हूँ,वरना तेरी टिप्पणियाँ लैप्स हो जायेंगी ! तुझको मेरी टिप्पणियाँ लग जाये.. कलह क्लेश देने के बाद ब्लागर के पास देने को टिप्पणी के अलावा होता ही क्या है ? तुझको मेरी टिप्पणियाँ लग जाये.
इस इपिसोड में होस्ट को मैंने दोस्त में बदलने का आग्रह किया है.. अपनी आयु के बढ़ते अंको के बल पर इस तरह की पाँय-लागी
कब तक चलेगी, बंधु मेरे ? वैसे भी हिन्दी दिखते ही मुझे अंग्रेज़न मौसी डायन लगने लगती है.. मेरी माता की सौत बन कर राजपाट हड़पे है, मुई ! वैसे होस्ट भी थोड़ा ज़ालिम लगता है, न ? ये जरा इनके तेवर तो देखो.. होस्ट.. होस्टेज़.. होस्टाइल अउर जाने क्या क्या.. सब्भी एक लाइन से नम्बरी डैंज़र वर्ड हैं, एक और अर्थ घोड़े का सईस भी होता है, सो, इनसे मालिश ज़रूर ही नहीं करवाऊँगा.. लेकिन वनगमन के वास्तविक अनुभव किसी अगली कड़ी में ?
| अई लेयो, इस बीच मनीष मास्टर चुप्पे से कहाँ सरक लिये.. जरा देखिये तो किधर हैं ? अईयो मासटर जे, कुश जी को तोड़ा समजाओ जे । या अमको काफ़ी पीने को बुलाता । नाराज़ नईं ओने को.. जे अम आपको बाई बोलता.. बाई अम बोलता सब्बी ब्रदर को जे । अबी अबी अमारा आम्मा बिमार से उटा जे.. अम इसको चोड़ के कईसे जायेगा जे ? अम काफ़ी पियेगा के चिठा लिकेगा ? चिठा लिकेगा कि टिप्पने करेगा जे ? दोनो करेगा तो आपको कब्बी को पडेगा जे ? याः सब्बी सात सात करेगा तो काम कब्बी को करेगा जे ? अब अमको हेल्प करो , अमको बचके किदर जाना.. समज मे नई आता जे । इदर अमको बेलागिंग करना .. कि साहितअ की खीचड़ी बनाना, अमको कुच भी समज मे नई आता जे ! अब या देको ना..यक प्राएमरी का मास्टर पूचता के अमारा कविता.. कहीं ???? जरा आप बी पड के देको जे ! अईयो आप इस मफ़िक़ अँसना नईं ये अम बिल्कुल सई बोलता है जे ! मासटर अमको इसका मतबल नई समजाना कि अपना पुराना माल अम नया करके बेचता तो बैड बैड क्या होता जे ? अम तुमकू समजाना वास्ते विवेकसिंग का मारफ़त आपका कातिर चेन्नई से पेशल लैग्वेंज़ मँगाया जे । आप इसको समजो... ये बी आल इंडिया इन्दी का यक सैम्पल जे ! नई समजेगा तो अम इसको पकड़ के रकेगा जे.. टीक से समजाने को वास्ते आगे एक मोटा सरदार जी बुलायेगा जे ! डेरना को नईं .. पाबला को नईं बुलायेंगा.. पन मासटर जे, समजो के अम तो आलरेडी उतसाहित जे.. तब्बी अम आप सबका बी उतसाह बड़ाता .. . अम निवेदन करता जे उतसाह बड़ाने का बौत मेहनत का काम जे.. आगे इस माफ़िक नईं करने का मासटर, समजा ? जय हिन्द.. जय भारत ! |
{ यह तमिलभाषियों का उपहास नहीं, बल्कि वर्णलिपि में ख घ छ जैसे वर्ण के अभाव के साथ संस्कृत-तमिल.. व्याकरण में बोली जाने वाली हिदी की मज़बूरी है.. ‘ उदर बाजू से काना काने को आवाज़ लगता जे ‘ मेज़ पर खाना लग चुका है.. खाना खाने को पंडिताइन बुलाती, इस वास्ते अब्बी अम बी जाती .. आप उनेको तैंक-यू बोलना जे ! }











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