यूँ ही निट्ठल्ला, भला क्यों करता बकवास
गुनिये शायद निहित होगा यहाँ कुछ ख़ास
वरना तो समझिये बस निरर्थक टाइमपास
मानिये सहज गल्प, लँतरानी और परिहास

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26 May 2009

आज बड़े खुश लग रहे हो ?

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डिस्क्लेमर : यह पोस्ट श्री बज्राँग बली के नाम पर आरँभ किया जा रहा है, अनायास बिजली गुल हो जाने की दशा में पोस्ट पूरी न हो पाने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व केन्द्र व निष्कामी राज्य सरकार का होगा । इसका मायाराज से कोई लेना देना नहीं है !

रायबरेलीवासी मतदान के तत्काल बाद से विद्युतबाधा के बँधक बने हैं । सोनिया भाभी से माया ननदिया को उचित नेग मिलने तक यह तमँचा लगा रहेगा । अतः ब्लागिंग की बत्ती भी गुल है ! अफ़सरान के चेहरे की बत्ती गुल है, चाटुकारों की बत्ती गुल है । हे कपि, समय पड़े पर तू ओबामा के सँग हो लिया  और, कुसमय पर अपने देशी अडवानी श्रीराम चरण कमल रज  से ही रूठ गया ।  उनकी छोड़,  हम दीनों की तो सुन ले..

“ मुठिका एक महा कपि हनी ।

रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥ “

अरर..रर..र.. बिजली जाने ही वाली है, आने का भरोसा भले ही न हो.. जाने का पूरा भरोसा रहता है । यानि कि कार्यक्षमता में  पचास फ़ीसदी के सुधार से आप मुकर नहीं सकते । लुप्प लुप्प होन लगा भाई.. जल्दी समेट लें, जाण वाली  है । जाने दो, मेरा क्या ?

आपको ही यह पोस्ट पूरी न पढ़ने को न मिलेगी (वैसे भी पढ़ते ही कब  थे ?) आच्छा आच्छा, पढ़नी नहीं पड़ेगी.. तो सीधे सीधे ऎसे कहो न कि, इसीलिये आज बड़े खुश लग रहे हो !

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20 May 2009

विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका

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शहीद की अगली कड़ी देनी है । साथ ही अपना भी कुछ लिखने का मन बन रहा है, पर विरोध या अंतर्विरोध का कोई स्वर निकल ही नहीं पा रहा । क्या करें ?  सा रे गा से  उठाने पर  मा पर जाकर टिक जा रहा है ! यहीं से एक मुरकी लगाकर मा पर ही बिलँबित होना ठीक रहेगा.. कहीं ज्यादा क्लासिकल न हो जाय ?  मेरी पोस्ट सिर से ऊपर निकल जाने की शिकायतें वैसे भी अधिक आरही हैं । क्या करें ? ब्लागिंग छोड़ दें ? ख़ैर, जब छोड़ेंगे तब देखा जायेगा । आज तो कुछ लिखने की होती ही है, मँगल है.. वह भी बुढ़वा मँगल ! सुना है, ब्लागजगत में ’ बुढ़वा ’ की बहुत चलती है । सो, आज एक बार फिर ’ प्रयास करने ’ में क्या जाता है ? बुढ़वा अगर खुश हो गये, तो कोई भी माँगलिक अमाँगलिक अपशकुनी पोस्ट भी हिट ही समझो ! हिट हो.. या शिट, जब तलब लगी है, तो कौन रोक रहा है ? लिखना है तो लिख
आज पिटे हुये लालू को दौड़ाया जाय.. ? कुछ ही दिनों में उनकी पोस्ट-वैल्यू टके की तीन भी शायद ही रहे ? ना ना, निट्ठल्ले.. अपने कबीर को मत भूल.. ’निर्बल को न सताइये.. जाकी खोटी हाय !’ स्वदेशी रेल-प्रवर्तक थोड़े डिरेल हो गये.. तो इतने निष्ठुर भी ना बन जा ! तुम्हारे समोसे में ’आलू’ तो  है ना, फिर तू लालू की चिन्ता में दुबला मत हो !
अब थोड़ा थोड़ा क्लू मिल रहा है.. ’दुबला मत हो’ पर कुछ चल तो रहा था, उसी पर लिख दिया जाय, काऽऽ हो ? वहाँ अमन हो गया होगा, तो भी इत्ते बड़े ब्लागजगत में कहीं न कहीं या फिर एक साथ कई जगह आग तो लगी ही होगी !
मौज़ की ढाल में तो अपना भी हाथ वाथ सेंका जा सकता है ।  ॑॑ ॒॒॒ ॑ य़ॆ॑॑ ॑ ईआ ख ॒॒॑॑॑॑ .. आज कीबोर्ड साथ क्यों न दे रहा है, भाई ? क्या यह दूर से मौज़ लेने की शरीफ़ाना प्रवृति की ओर इशारा कर रही है ? या यह स्वयँ से ही क्षुब्ध है ? या  इसे  कोई  अँतरिक्ष  से  ही  तो  नहीं सँचालित कर रहा, कि विरोध ऎसे तरीकों पर इस तरह मौज़ लेने से कम से कम तुम तो बाज आओ ! लो भई, बाज आ जाते हैं !  कम्प्यूटर पर रह कर कीबोर्ड से बैर..भला कौन लेगा ? आज सबकुछ प्रतीकात्मक और अमूर्त ही रहे, तो क्या हर्ज़ है ? वैसे भी मेरी पोस्ट समझने और समझाने में नालायक साबित होती रही  है ! चलिये बँद करता हूँ । अब  ऎसी भी क्या नाराज़गी.. मेरा नमस्कार लेंगे भी, कि नहीं ?
kahin-aap-bhi
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15 May 2009

He is obselete, who is he ?

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यूँ तो अपन को किसी लफ़ड़े में पड़ने की आदत तो है, नहीं ? अब तक तक तो आप भी जान गये होंगे,कि, मैं अपना दामन बचा कर दूर से तमाशा देखने वाला एक आम शहरी आदमी हूँ । चाहें तो, मुझे शरीफ़ भी कह लीजिये, तो भी मैं बुरा न मानने का ! इसलिये मैं डा. अरविन्द के यहाँ से आते शोर से अपने को अलग ही रखे रहा । एक ब्लागर  दूसरे ब्लागर को  दे ही क्या सकता है, भला ? फ़क़त दो चार टिप्पणी या गाली गलौज़ तो आम बात है, ऎसे शैतानी पोस्ट पर  भी यदि साधु वाद आ जाय.. तो अपवाद ही मानो ! अपवाद यूँ कि, साहित्यिक गोष्ठियों जैसी नेटवर्किंग यहाँ उतनी परिपक्व न हो पायी है, या फिर कोई हिन्दी ब्लागर अपने सम्मान समारोह का आयोजन करवा कर उसमें पैसा लगाने जैसा ज़ोखिम अभी तो नहीं ही ले रहा है ! आगे की, ....?... जाने ( इंडिया सेक्यूलर या नान-सेक्यूलर, जब तक यह सुप्रीम कोर्ट तय करें.. तब तक यह स्थान रिक्त ही रहने दो ) ! एक ब्लागर की पहचान खतरे में है, चलो बड़ा अच्छा है.. यह गवारा न हुआSLL-torso

SLL-Lower

दूर की कौड़ी निहार रहे.. या अपने ब्लागरीय सँदर्भ तलाश रहे हों, भाई ज़ान ! हम्मैं क्या, हम शरीफ़ आदमी है, न बोलेंगे

 

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.
शायद मैं अपनी बात रख पाया.

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.
शायद मैं अपनी बात रख पाया.

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.

इहाँ हमार कुछौ नाहीं, जौन जौन लिखा काटा अउर बेकाटा देखात है । उनपे चटका लगाओ, खुद जान जाओ । फोटू के ऊपर का हिस्सा कुछ और पढ़वाता है, नीचे का हिस्सा दीपक बाबू झटके लिये जा रहे हैं, चटका... चटका.. फढ़ो मत चटका लगाओ.. असल माल उधर है । " ऎई..  कोई काम नहीं है, क्या ? और फिर.. निट्ठल्ले पर बैठे हो ? "  अहाहा.. तभी तो मैं कहूँ, आज मेरी पँडिताइन कहाँ रह गयी ? वह आ जातीं तो यह पोस्ट समेट लेता ! भावावेश में यह पोस्ट स्टार्ट तो कर दिया था.. दि एन्ड कब और कैसे होगा ? यह तो खुद समीरलाल भी नहीं जानते ।  जिनको वक़्त की मार ने प्रेमी से उड़नतश्तरी बाना दिया । सिद्धै जबलपुर से सर्रर्रर्रर्र हो गये, ज़ानम समझा करो !
बड़ी बिफ़रैल नार है, भाई यह तो ? मेरी बोलती बन्द करने को बोलती हैं, " ज़ानम क्या ख़ाक समझें ? आप यह सब बन्द करिये, इस समय घर घर में सरकारें बनायी और गिराई जा रहीं हैं, लास्ट टू देज़ बचे हैं । आओ शगुन के लिये ही सही, हमलोग भी सीटें मिलि बाँटि लें । "

मैं उठ रहा हूँ, मित्रों । इस बँटवारे में निट्ठल्लादेश की परवाह ही कौन करता है । इस महापर्वनुमा लोकतंत्र के महाकुँभ की  सीटनुमा रेवड़ी कब की बँट चुकी होंगी.. आओ शगुन तो कर ही लिया जाय । चाहें तो निच्चू के लाइनों पर भी  एक चटका लगाय दें । "  हा विधना... काहे को भया चटकामय यह सँसार.. "

हिजड़ों की बारात है, जो सब चुन करके आए
फिर ये ऐसा क्या हुआ कि बाहर से उन्हें बुलाए
बाहर से उन्हें बुलाए कि सब के सब दामाद तुम्हारे
कुछ खुद का नहीं ठिकाना, तुम्हरे का काज संवारे?
अभी संभल जा, अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है
वरना ये बैठेंगे गद्दी पर और कहें कि तू हिजड़ा है.

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

 

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना व

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

ज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्का
दशायद मैं अपनी बात रख पाया.किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के

धन्य

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

वलिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.

धन्यवाद, फोटू वाले साहब, यदि इसबार आप सलीके से अपलोड हों जायें । यह मेरा छठा प्रयास है, और..  यह इतना वज़न रखते हैं, कि नेटवर्क में फँस कर फिर वापस आ जाते हैं । लद जा भाई .. लद जा .. मेरे को क्लिनिक जाने की देर हो रही है.. वहाँ भी मरीज़ बैठे अपनी अपनी सरकारें बना रहे होंगे । नमस्कार !

 

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है औ

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच ए लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.

शायद मैं अपनी बात रख पाया

र दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.

शायद मैं अपनी बात रख पाया

इससे आगे

7 May 2009

आख़िरी ज़रूरत – µ पोस्ट

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एक सफल मनुष्य, जो अपने जीवन में हर कुछ हासिल कर चुका हो, अब और क्या चाह सकता है ?

ATT00003अपने जीवित रहने के चँद ज़रूरतें, और कुछ नहीं !  यानि  एक डाक्टर, एक वकील और ज़ेड सेक्यूरिटी !

इससे आगे
यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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