यूँ ही निट्ठल्ला, भला क्यों करता बकवास
गुनिये शायद निहित होगा यहाँ कुछ ख़ास
वरना तो समझिये बस निरर्थक टाइमपास
मानिये सहज गल्प, लँतरानी और परिहास

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29 July 2009

भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

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पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई !
चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू
ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक...  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक ।
बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू

आजकल बड़ा बूझा और बुझाया  जा रहा है, सोचा निट्ठल्ले बैईठ से तो अच्छा है कि, हमहूँ कुछौ बूझि जाँचि लेयी..    कल हो ना हो ! वो क्या है कि,

कहते हैं ना ..यह ब्लागर की बस्ती है..यहाँ पोस्ट मँहगी और टिप्पणियाँ सस्ती है ।                                       सो, अँतरिम राहत के लिये  एक सस्ते दरों का पोस्ट दिया जा रहा है, निर्वाह कीजिये ।

pahchan-kaunयह ख़ानम बीते हुये ज़माने की खँडहर नहीं, क्योंकि यह स्वयँ ही कहती हैं कि, " मैं तो नब्बे वर्ष की ज़वान हूँ ! " अपने को भारत का प्रथम ’ न जानि क्या कुछ ’  बताती हैं । इनका नाम है.. उड़ी बाबा, ज़वाब तो आपको देना है । ज्ञानियों के तरकश तो तीरों से ख़ाली हो चुके हैं, इसलिये यहाँ अज्ञानियों का तुक्का भी बिना किसी मर्डरेशन के चलेगा । ज़रूरत बस इतनी ही है कि, चलाइये तो सही ?

इससे आगे

7 July 2009

हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

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सोचा कुछ - हुआ कुछ और ही है
निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है
सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा
अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक
शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक
बेटी को फोन लगाया, उछल पड़ी " पापा सच्चीऽऽ ?
बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ?
बिसूरता बुद्धू बक्सा खिल पड़ा, बोला आजा मेरे कोल आ
साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का
तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ
नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ
घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ
बजट क्या रे ? वह तो आ भी गया..
आकर जाने कब का चला भी गया
गिली गिली बूम पटाक हुर्र हुश्श छूः
प्रोणोब काकू ने सूँ चिड़िया उड़ा दिया
money_world
अँय ? अखिल भारतीय फ़िनेन्स मेनेस्टर प्रोणोब दा ने दू मीनिट में शोबका चिरीआ उरा दीया
अब तो मरे  भूखन भाय, तेखनोई गोलमगोल कोरता था, गेहूँ सेरे एक रुपिया तीन झुठलाय दिया,
अस बुद्धू बक्सा दिहौ चिढ़ाय
मुझ सा बुद्धू ना जग में पाय
डाक्टर साहेब गयो खिसियाय
लौटे ब्लागर यों घर को आय
आपन टेक ना रख पाय
मूड़ निहोरे यह गुनगुनाय


हूँऽऽ हूँऽ बजट्ट अली बजट्ट अली
 
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
प्रोणो अईसे दिये उराय बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
ममता ना बरसा पाया तू बजट्ट अली
कैसे तू पल में झटक गयी
निर्धन खेतिहर से दूर फटक मटक मटक
भूली तू गाम कस्बे औ स्लम की गली

ऑय बजट्ट अली ऽऽ मैंऽऽऽऽय य य यीहः ऎ ऎ यीहः
 
बेशर्म न हो तू ज़हालत से बच 
यूँ मसल ना मेरीऽऽह तमन्ना
ज़मीं से जुड़ पर तू हमीं से टुर्र
पर्रर्र भुर्रर्र भुर्र भर्र भर भर भर
टाँय टाँय फिस्स तू आकड़ों की हेरा फेरी रे
 
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजवा दिया बाजाऽऽह सुन खरी खरी
पलट्ट ! ऒये पलट्ट जरा ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
बसेरा तू करती एक हाथ दूरी
दहा सफ़दरजँग के बाजू पीछे
दिखाती क्या ठेंगा तू क्या इस वज़ह से
बहुमत है तो क्यों डरियो रे 
कर मनमानी कर मनमानी मनमानी
पर बचियो ना कर यूँ तुम ये नादानी
देती जो थोड़ी रे थोड़ी मुस्कान रे
होता ये मन सनाना नाना सनन साना रे
 
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हेहे हे हे हे हेहे हो
रा रारा रा रारा रारा रो

अबे रो बे... जरा सुर में रो
ऊँ ऊँ ऊँऊँ ऊँ ऊँ ऊँआँ आँ
आँ आँ आँआँ आँ आँ आँआँऽऽऊँ
अच्छा उट्ठो, नाक पोंछों, थोड़ा पानी पियो मन हल्का हो जायेगा...
कितनी बार कहा कि सेन्टीमेन्टल हो न्यूज़ मत देखा करो,समाचार के सम-अचार का मसाला तुम्हें कभी से भी नहीं सूट किया करता है ! 6a00e0097e4e6888330112796f1e9c28a4-800wi
चलो नाक पोंछों, थोड़ा पानी पियो मन हल्का हो जायेगा ।
बड़े दिनों बाद पँडिताइन का दखल हुआ, पर इन्होंनें यह कैसे जाना कि गरीब देश की गरीब जनता के आँसू सूख चुके हैं ? इनका  सरोकार  तो  कभी  गैस  चीनी  दाल  और  वनस्पति तेल  से  ऊपर  उठा ही नहीं ? रहस्यकम तात.. सूक्ष्मातिक्षूम रहस्यकम ! और यह भी कि, जनता अब पानी पीकर गुज़ारा करने पर ही मज़बूर है ? पानी भी यदि सुलभ हो जाये तब, क्योंकि उसके नेताओं के आँखों का पानी तो मर चुका है, बचा खुचा पानी वह चुनावी भाषणों में बहा-टपका चुके हैं ! रा रारा रा रारा रारा रो.
इससे आगे
यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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