सोचा कुछ - हुआ कुछ और ही है
निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है
सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा
अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक
शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक
बेटी को फोन लगाया, उछल पड़ी " पापा सच्चीऽऽ ?
बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ?
बिसूरता बुद्धू बक्सा खिल पड़ा, बोला आजा मेरे कोल आ
साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का
तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ
नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ
घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ
बजट क्या रे ? वह तो आ भी गया..
आकर जाने कब का चला भी गया
गिली गिली बूम पटाक हुर्र हुश्श छूः
प्रोणोब काकू ने सूँ चिड़िया उड़ा दिया
अँय ? अखिल भारतीय फ़िनेन्स मेनेस्टर प्रोणोब दा ने दू मीनिट में शोबका चिरीआ उरा दीया
अब तो मरे भूखन भाय, तेखनोई गोलमगोल कोरता था, गेहूँ सेरे एक रुपिया तीन झुठलाय दिया,
अस बुद्धू बक्सा दिहौ चिढ़ाय
मुझ सा बुद्धू ना जग में पाय
डाक्टर साहेब गयो खिसियाय
लौटे ब्लागर यों घर को आय
आपन टेक ना रख पाय
मूड़ निहोरे यह गुनगुनाय
हूँऽऽ हूँऽ बजट्ट अली बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
प्रोणो अईसे दिये उराय बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
ममता ना बरसा पाया तू बजट्ट अली
कैसे तू पल में झटक गयी
निर्धन खेतिहर से दूर फटक मटक मटक
भूली तू गाम कस्बे औ स्लम की गली
ऑय बजट्ट अली ऽऽ मैंऽऽऽऽय य य यीहः ऎ ऎ यीहः
बेशर्म न हो तू ज़हालत से बच
यूँ मसल ना मेरीऽऽह तमन्ना
ज़मीं से जुड़ पर तू हमीं से टुर्र
पर्रर्र भुर्रर्र भुर्र भर्र भर भर भर
टाँय टाँय फिस्स तू आकड़ों की हेरा फेरी रे
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हम फड़फड़ाये मूँ बिराये बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजवा दिया बाजाऽऽह सुन खरी खरी
पलट्ट ! ऒये पलट्ट जरा ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
बसेरा तू करती एक हाथ दूरी
दहा सफ़दरजँग के बाजू पीछे
दिखाती क्या ठेंगा तू क्या इस वज़ह से
बहुमत है तो क्यों डरियो रे
कर मनमानी कर मनमानी मनमानी
पर बचियो ना कर यूँ तुम ये नादानी
देती जो थोड़ी रे थोड़ी मुस्कान रे
होता ये मन सनाना नाना सनन साना रे
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
उम्मीदें फुर्र कर गयी बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
ऑय बजट्ट अली बजट्ट अली
हेहे हे हे हे हेहे हो
रा रारा रा रारा रारा रो
अबे रो बे... जरा सुर में रो
ऊँ ऊँ ऊँऊँ ऊँ ऊँ ऊँआँ आँ
आँ आँ आँआँ आँ आँ आँआँऽऽऊँ
अच्छा उट्ठो, नाक पोंछों, थोड़ा पानी पियो मन हल्का हो जायेगा...
कितनी बार कहा कि सेन्टीमेन्टल हो न्यूज़ मत देखा करो,समाचार के सम-अचार का मसाला तुम्हें कभी से भी नहीं सूट किया करता है !
चलो नाक पोंछों, थोड़ा पानी पियो मन हल्का हो जायेगा ।
बड़े दिनों बाद पँडिताइन का दखल हुआ, पर इन्होंनें यह कैसे जाना कि गरीब देश की गरीब जनता के आँसू सूख चुके हैं ? इनका सरोकार तो कभी गैस चीनी दाल और वनस्पति तेल से ऊपर उठा ही नहीं ? रहस्यकम तात.. सूक्ष्मातिक्षूम रहस्यकम ! और यह भी कि, जनता अब पानी पीकर गुज़ारा करने पर ही मज़बूर है ? पानी भी यदि सुलभ हो जाये तब, क्योंकि उसके नेताओं के आँखों का पानी तो मर चुका है, बचा खुचा पानी वह चुनावी भाषणों में बहा-टपका चुके हैं ! रा रारा रा रारा रारा रो.