यूँ ही निट्ठल्ला, भला क्यों करता बकवास
गुनिये शायद निहित होगा यहाँ कुछ ख़ास
वरना तो समझिये बस निरर्थक टाइमपास
मानिये सहज गल्प, लँतरानी और परिहास

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8 September 2009

चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

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जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ... यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू... वाः वाः कौन कहता है, कि  आपने  कभी  कोई  वाह-वाह पोस्ट भी लिखी है ? किसीके यह पूछने से पहले ही, यह बता देता हूँ कि, भाई इब मन्नैं भी एक गुट बना लिया है । आठ-दस फोन नम्बर भी बटोर लिया है । चाहोगे तो अपने पोस्ट किये जाने वाली टिप्पणी का डिक्टेशन भी दे दूँगा, मुफ़्त.. मुफ़्त.. मुफ़्त.. !
भले आप दरिया किनारे जाकर मुर्गी के अँडे छील कर उबाल लो, उस  उबले  अँडे का आमलेट तक हम्मैं निगलवा दो... लेकिन यह जान लो कि मेरी तो आठ-दस रेडीमेड वाह-वाह टिप्पणी  पक्की  ही  है । हमरा एक निर्गुट कबीर गैंग जो है । इसके सभी निर्गुणिया सदस्य , अपने  लोगों  के  लिये  वाह-वाह  हरमुनिया बजाने में निष्ठावान गुणी हैं । मैं अँट-शँट नहीं बक रहा भाई.. और  न  ही  मेरे  पास  इस  पोस्ट  को लँबा खींचने की फ़ुरसतिया-पावर है । डारविन के रिश्ते से स्वाइन जी कभी तो हमारे पितर रहे होंगे..
पितर  का कर्ज़ उतारने का मौका अच्छा रहा । सो, स्वाइन महाराज के तर्पण को एक पोस्ट लिखने बैठा, और फुस्स हो गया । बड़े लोचे हैं, इस स्टोरी में…. दायें  हाथ  मौत  बाँटी  जाती  है और  बायें  हाथ सँजीवनी  बेची  जाती है । चुनार के किले का तिलिस्म फेल.. नौगढ़  एवं  विजयगढ़  के  राजाओं  को ज़ालिम  क्रूर सिंह महाजन  के  आगे  पानी  भरते  देख  मेरा रहा-सहा  दिमाग  भी बौरा  गया । जरा मीडिया  की  कबूतरबाज़ी   थमे, तब्भी  मेरा  पोस्ट  चलेगा ! अक्खा यह अपुन का इंडिया है, जहाँ सभी उड़ाते चिड़िया हैं । धात्त.. मैंने तो कहा था कि, आज कुछ भी आँय बाँय शाँय नहीं लिखूँगा,.. आई एम सॉरी भाई ।6A1Aआज  ब्लागिंग  के  मद  में डेढ़  घँटे एलाट हुआ था । मैंनें  पहले ही कहा  था  न  कि, आज  कुछ  न लिखूँगा !   सो  लगे  हाथ  इसी  में  टाइम  खोटी  कर  लिया । परीक्षा  की  उत्तर-पुस्तिकाओं  पर  ऎसे टाइमपास  का अभ्यास  तो  बहुत  पहले ही  कर  लिया था । अब काम आ रहा है ।  आई एम सॉरी भाई !
इससे आगे

6 September 2009

माडरेशन की प्रतीक्षा में

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इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी,
दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी ।
पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !"
दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?"
हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये ।
पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।"
दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?"
अब शर्त लगा ले..  और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी ।
किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है ?
जो हारेगा , आख़िर उसी को पैसा भी तो भरना पड़ेगा कि नहीं ?
बीस रूपये की शर्त लग गयी । अगर तू पेशाब में भीग गया तो बीस रूपये तेरे, वरना तुम्हें बीस रूपये देने पड़ेंगे । चल ठीक है, चल ठीक है ! पहला उसे कोने में ले गया, और उसके ऊपर झर झर मूत दिया । दूसरा सिर से पाँव तक तर हो गया ।
पर, वह खुशी से चीख उठा, " देखो देखो, मैं तो पूरा भीग गया ! "
जनता ने देखा, सबने देखा, हर आते जाते ने देखा और उसके पक्ष में खड़ी हो गयी, " भई तू शर्त हार गया है, चल इसे बीस रूपये दे ।" पहले ने कहा, " मैं कब कह रहा हूँ कि, मैं जीत गया ?  यह ले अपने बीस रूपये ! " उपस्थित भीड़ ने मज़ा लिया और चले गये अपने अपने रास्ते ।

उनकी यारी न टूटी, शाम को दोनों अपनी रोज की तलब ख़ारिज़ करने को इकट्ठे हुये ।
दूसरे ने पूछा, " यार यह बता कि तुमने यह कैसे सोच लिया कि तेरी हरकत से मैं नहीं भीगूँगा ।"
पहले ने शाँति से ज़वाब दिया, " मैं जानता था कि तुम क्या कोई भी भीग जायेगा ।"
दूसरा चौंका, " फिर ? "
पहले ने कहा, " यार यह बता कि तुमको ताव दिलाया और इतना मज़मा इकट्ठा हो गया, और तू भी सराबोर हो गया कि नहीं ? " दूसरा हँसा, " इससे तुम्हें क्या फायदा हुआ ।"
पहले ने कहा कि, " फायदा नुकसान मैं नहीं जानता । 
तू यह बता कि बीस रूपये में यह डील क्या बुरी रही ? "  ACapture

मैं जानता हूँ, भाई कि इस पोस्ट से लम्बी यह  टिप्पणी सार्थक  नहीं है, और यहाँ माडरेशन भी लगा है । फिर भी, इस साझा मँच पर एक  पाठक के नाते अपनी निरर्थक बात  भी कहने का अधिकार तो है, ही !

अब इस पहेली का हल सोचता हूँ । उत्तर सही लगेगा, तो टिप्पणी बक्से का दुबारा उपयोग करूँगा ।
आपकी टैगलाइन
" इस ब्लॉग पर लिखी बातों का मेरी विचारधारा से मेल खाना आवश्यक नहीं है,यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं . अत: किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ! " से बल मिला सो साहसपूर्ण यह टिप्पणी चेंप रहा हूँ ।

इससे आगे
यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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